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 आप हिम्मत का एक कदम बढाओं तो परमात्मा की सम्पूर्ण मदद आपके साथ होगी !

उदारता

अगर मैं प्यार को सीमित करता हूँ तो मैं सिर्फ एक या दो को दे दूँगा , अंततः बासी हो जाएगी। यदि मैं अपने दिल के अंदर परोपकारी प्रेम पैदा करना सीखता हूं और फिर चुपचाप कई लोगों को प्यार करता हूं , तो प्रेम मेरे जीवन के हर कोने की कृपा करेगा। रचनात्मकता संवर्धन के लिए आंतरिक संसाधनों का उपयोग करना है स्थिति हमें दे हमारे लिए अप्रयुक्त संसाधनों का सृजनात्मक उपयोग करने का मौका अन्यथा परिस्थितियां हमारी स्पष्ट सोच को दूर करती हैं , हमारी हमारी धारणा है संसाधनों और इसलिए हम कमजोर और कमजोर हो जाते हैं। हमें पहले की आवश्यकता है समझें कि कठिन परिस्थितियों में बाधाएं नहीं हैं , लेकिन हैं हमारे लिए अपने स्वयं के सभी संसाधनों का रचनात्मक उपयोग करने के लिए अवसर संवर्धन। जब मैं इसे समझता हूं , तो मैं पहले समझता हूं मेरे पास क्या है और इसका इस्तेमाल प्रगति के लिए है सुप्रीम होने या भगवान के बारे में विभिन्न अवधारणाओं विशाल बहुमत के लिए सर्वोच्च या भगवान से संबंधित कई प्रश्न अनुत्तरित रहते हैं और इसलिए भगवान का अनुभव अपूर्ण नहीं रहता है। ईश्वर के बारे में अवधारणाओ...

मनन से लगाओ ध्यान

मनन से लगाओ ध्यान   आज की दुनिया में टेक्नोलोजी पर आधारित है, आज पायलट से लेकर अन्तरिक्ष यात्री तक सभी इन तरंगो का इस्तेमाल करके संपर्क स्थापित करते है, जिसमे लाइट,साउंड और विघुत चुम्बकीय तरंगे शामिल है | लेकिन इसका एक सीमित दायरा है | वैसे ही हमारे इन्द्रियों में भी एक सीमित दायरा है , आंख का कान का, भी एक सीमित दायरा है,जिससे हम एक दुरी तक ही देख सुन और समझ सकते है | लेकिन आप सोचिये जरा इतना नजदीक जब आप , किसी से बात करने के लिए, इन यंत्रो को अच्छी तरह से सम्भाल कर रखते है, उनका ध्यान रखते है,फिर भी कभी संपर्क नै हो पाता, नेटवर्क की प्राब्लम के कारण | इसलिए परमात्मा से यदि हमें संपर्क साधन हो, तो सबसे बड़ी पॉवर,विचार-शक्ति का इस्तेमाल करना होगा |क्योंकि उपरोक्त संपर्क प्रकृति के साथ ही था, लेकिन परमात्मा तो प्राकृतिक शक्तियों से परे है, इसलिए उससे थोडा अलग तरीके से मिलना होगा | भावना की शक्ति, मनन-शक्ति से हम इस दुनिया के पार कही भी आ-जा सकते है | अतः मनन या मेडिटेशन ही परमात्मा के साथ हमें जोड़ सकता है | इससे इतना फायदा है कि आप सोच भी नहीं सकते है | प्रभु चिंतन स...

हर समस्या का हल

  जब मनुष्य इन सत्यताओं को भली-भांति समझ जाता है कि-यह संसार परिवर्तनशील है और इसके सभी पदार्थ क्षण भंगुर तथा नाशवान है | मनुष्य को पहले-से यह भी ज्ञात नहीं है कि उसके जीवन की अवधि क्या है, तब वह इस संसार और यहाँ के व्यक्तियों तथा पदार्थो के प्रति अनासक्त भाव वाला हो जाता है | जैसे नाव नदी में रहते हुए भी उसके ऊपर रहती है, विअसे ही उसका मन भी उपराम-सा रहता है | उसमे लोभ और क्षोम शांत हो जाते है | वह दूसरो से छीना-झपटी नहीं करता | सांसारिक वैभवों और इन्द्रियों के विषयों से लतपत नहीं होता है, ना ही मित्रो-सम्बन्धियों के अनुराग की दलदल में धंसता है | वह हल्का होकर उड़ता-सा रहता है | वह बैल की तरह तब भर कर खाने की बजाये दो रोटी खाकर ईश्वरीय स्मृति का आनंद लेता है | गरीब है तो क्या हुआ, भगवान् तो उसका साथी है | गुण......गुण....की धुन लगा ले उस विरक्त भाव या उपराम वृत्ति के साथ-साथ जब उसे इस बात में भी दृढनिश्चय हो जाता है कि मनुष्य का सौभाग्य और दुर्भाग्य दोनों स्वयं उसी के कर्माधीन है, स्वर्ग या नरक की प्राप्ति उसके अपने दिव्य गुणों या अवगुणों ही के परिणामस्वरूप होती ह...

पहचाने अपने मन की अदभुत शक्ति को

हमारे साथ आज जो कुछ भी घटित हो रहा है, वो हमारी समझ के आधार से ही हो रहा है | हम मन द्वारा चमत्कार करने की कोशिश कर रहे है, लेकिन कही न कही कुछ मिस कर रहे है, जिससे चमत्कार हो तो जाता है, लेकिन उल्टा | हम ये नहीं कह रहे कि आप हमेशा ही उल्टा करते, लेकिन उसे यदि एक दिशा दी जाए तो चमत्कार सही दिशा में होगा | हमारे संबंधो से इन बातो को हम जोड़ने की कोशिश करते है की आज हमारे सम्बन्ध इतने अभयस करने के बाद भी ठीक नहीं हो रहे, कि हम उनको सुनते भी है, समाते भी है, सहन भी करते है, लेकिन हमारा अनुभव हमें संतुष्टता प्रदान नै करता | आज हम इसके कारण को समझते है | देखिये हो क्या रहा है, कि आकर्षण के सिद्धांत के अनुसार हम अपने आप को जो समझते है वही हम आकर्षित करते है, ये जगजाहिर है | इस सिद्धांत को यदि हम संबधो पर लागू करे तो क्या होगा ? अब जो आप समझते है, वही तो आकर्षित करेंगे ना | अभी आप अपने आप को एक पत्नी समझेगें या पति समझेंगे या पिता समझेंगे या पुत्र समझेंगे तो उसके अनुसार ही उन संबंधो के विपरीत या समान लोग आपकी तरफ आयेंगे, और यही हो रहा है | हम अपने आप को जो समझ रहे है, वैस...

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