परचिन्तन पतन कि जड़ मनुष्य का मन सदा कुछ न दुच चिंतन तो करता ही रहता है | जैसा चिंतन वह करता है वैसा उसका स्वभाव बन जाता है कुछ लोग तो दुसरो के प्रति कल्याण कि भावना रखते हुए अपने विकास में ही अपना समय और अपने संकल्प सफल करते है वे दुसरो से भी गुण ही लेते है |वे स्व-चिंतन करते हुए आत्मानुभूति के रस में लवलीन रहते है , पर –चिंतन करके अपने मन को मैला नहीं करते | आत्मिक शक्ति के विकास के लिए आत्म-चिंतन आवश्यक है |आत्म –विस्मृति के कारण मनुष्य शरीर से अपना तादात्मय स्थापित कर लेता हिया और घोर देहभान में फँसकर विकारी दुखी और अशांत हो जाता है | तब आत्म –चिंतन द्वारा ही वह आत्माभिमानी और निर्विकारी बनकर सच्ची सुख-शान्ति कि प्राप्ति कर सकता है | मै पांच तत्वों का बना विनाशी सरीर नहीं वरन सदा जगती ज्योती सर्वशाक्तिवन परमपिता परम आत्मा शिव कि संतान ज्योतिबिंदु आत्मा हूँ इस सत्य कि गहरी अनुभूति हो जाने से ...