Skip to main content

Translate

 आप हिम्मत का एक कदम बढाओं तो परमात्मा की सम्पूर्ण मदद आपके साथ होगी !

परचिन्तन पतन कि जड़




                 
              परचिन्तन पतन कि जड़
मनुष्य का मन सदा कुछ न दुच चिंतन तो करता ही रहता है | जैसा चिंतन वह करता है वैसा उसका स्वभाव बन जाता है कुछ लोग तो दुसरो के प्रति कल्याण कि भावना रखते हुए अपने विकास में ही अपना समय और अपने संकल्प सफल करते है वे दुसरो से भी गुण ही लेते है |वे स्व-चिंतन करते हुए आत्मानुभूति के रस में लवलीन रहते है , पर –चिंतन करके अपने मन को मैला नहीं करते |
आत्मिक शक्ति के विकास के लिए आत्म-चिंतन आवश्यक है |आत्म –विस्मृति के कारण मनुष्य शरीर से अपना तादात्मय स्थापित कर लेता हिया और घोर देहभान में फँसकर विकारी दुखी और अशांत हो जाता है | तब आत्म –चिंतन द्वारा ही वह आत्माभिमानी और निर्विकारी बनकर सच्ची सुख-शान्ति कि प्राप्ति कर सकता है | मै पांच तत्वों का बना विनाशी सरीर नहीं वरन सदा जगती ज्योती सर्वशाक्तिवन परमपिता परम आत्मा शिव कि संतान ज्योतिबिंदु आत्मा हूँ इस सत्य कि गहरी अनुभूति हो जाने से हमारे जीवन में एक दिव्या और अलौकिक परिवर्तन आता है |
सर्वशक्तिमान परमात्मा कि संतति होने पर बी हम असक्त और असमर्थ कैसे हो सकते है? आनंद के सागर और शान्ति के सागर कि संतान हम दुखी और अशांत क्यों है ? प्रेम के सागर परमात्मा के बच्चे भला आपस में लड़-झगड़ कैसे सकते है ? इस तरह गुणों के सगर परमात्मा के दिव्य क चिंतन करने से वे गुण हमारा स्वभाव बनते जाते है और धीरे-धीरे हम सर्वगुण सम्पन्न बन जाते है | अत: आत्म चिंतन और ईश्वरचिंतन ही आत्म कल्याण का एकमात्र साधन है |
निर्विवाद सत्य है कि मनुष्य दुसरो में वही अवगुण देखता है जो स्वयं उसमे विद्यमान रहता है बाह्म संसार दर्पण मात्र है जो हमारी आत्म को सत्य रूप में प्रतीबिम्बित करता है उस दर्पण में वास्तविकता का दर्शन कर सकते है | अर्थ लोलुप व्यक्ति को सभी लोग घोर भौतिकवादी प्रतीत होंगे और विषयी को साडी स्रष्टि काम पीड़ित द्रष्टिगत होगी | जब हम किसी कि ओर एक अंगुली उठाते है तो बाकि चार अंगुलिया स्वत: ही हमारी ओर उठ जाति है | यह भी सिद्ध करता है कि दुसरे में जो अवगुण हम देखते है वह हममे उससे चार गुना है अधिक विद्यमान है | अत: अध्यात्मिक साधको को पर चिद्रन्वेंष्ण न करे उन अवगुणों कि जड़ अपने में ही खोजनी चाहिए |


    

Comments

People read the most:

बुरे ब्यक्ति का जीवन राजयोग ही बदल सकता है

जानें, 100 मर्डर करने वाला 1 करोड़ का इनामी डाकू कैसे बना ‘महात्मा’ ग्वालियर.खूंखार डाकू,चंबल के बीहड़ों का राजा,550 डाकुओं का सरदार और लगभग 125 कत्लों के आरोप में भारत सरकार द्वारा दो करोड़ रुपए का इनामी *डाकू पंचम सिंह* Dacoit Pancham Singh आज का राजयोगी बन चुका है। अब लोगों के मन को परिवर्तित करने में अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। कभी चंबल के बीहड़ों में बंदूक की नोक पर दहशत का पर्याय रहा डाकू सरदार पंचम सिंह राजयोगी बनने के बाद देशभर में अध्यात्म की अलख जगा रहा है। पंचम ने अध्यात्म और आत्मविश्वास के बल पर जिंदगी बदलने के गुर सिखाए। 550 डाकुओं ने किया था समर्पण चंबल के बीहड़ों में दहशत के रूप में कुख्यात पंचमसिंह जमीनदारों के सताने पर परिवार का बदला लेने के लिए डाकू बने। पंचायत चुनाव के दौरान एक पक्ष का समर्थन करने पर विरोधी गुट के लोगों ने इतना बेरहमी से पीटा कि लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। इलाज के बाद जब गांव लौटा तो ग्रामीणों पर उत्पीडऩ शुरू हो चुका था। विरोधी गुट हावी था। हर किसी का जीना दुश्वार था। फिर क्या था कूद पड़े चंबल के बीहड़ों में 12 डाकु...

मुस्कुराने से सभी मुश्किले दूर हो जाती है

       मुस्कुराने से सभी मुश्किले दूर हो जाती है                          ऐसे करे इर्ष्या का उन्मूलन  उपलब्ध इतिहास का अध्ययन करने पर हम पाते है कि बहुत सी स्थितियों में मात्र इर्ष्या विकार ने इतिहास को नकारात्मक रूप दे दिया है | इर्ष्या क्या है ? इर्ष्या क्यों पैदा होती है ? इर्ष्या का मनोवैज्ञानिक पहलु क्या है ? इर्ष्या के कार्यक्षेत्र कौन- कौन से है ? इर्ष्या कैसे दूर हो सकती है?आइये इन प्रश्नों के उत्तर खोजे | इर्ष्या एक नकारात्मक विचार है जैसे कि यह इअसा क्यों है ? मैंने इतना कुछ किया , मुझे इतना कम क्यों ? इसने तो बहुत कम किया इसे,इतना ज्यादा क्यों? इसे मुझसे ज्यादा क्यों मिला? इसके पास ये-ये प्राप्तियां ज्यादा क्यों है? ये सब इर्ष्या के विचार है | इर्ष्या का अर्थ है , अन्य किसी कि स्थूल सूक्ष्म जो भी प्राप्तियां है उनके प्रति स्वीकार्य भाव का नहीं होना | किसी कि भी , क...

धर्म और कर्म का तालमेल

मानव आत्मा जब तक शरीर में है, कर्म से मुक्त नहीं हो सकती | उसमे भी युवावस्था सर्वाधिक कार्यशील अवस्था है | इस अवस्था में उसमे अतिरिक्त शक्ति होती है | यदि इस अतिरिक्त शक्ति का रचनात्मक कार्यों में प्रयोग न किया जाए अथवा युवकों को संतोष,शांति,सद्विचार देने वाला कोई उपाय न अपनाया जाये तो वह अतिरिक्त शक्ति या तो उन्हें बुरी आदतों में दाल देती है या वे उन शक्तियों का दुरूपयोग विध्वंसात्मक गतिविधियों में करते है | अतः कर्म के साथ धर्म अर्थात सद्गुणों की धारणा का संतुलन बाल्यकाल से ही अनिवार्य है | हम कह सकते है कि जब मानव सर्वाधिक कर्मशील हो तब उसका सर्वाधिक धर्मशील होना भी अनिवार्य है |                    धर्म कहता है, झुक जाओ  मान लीजिये, दो गाड़ियाँ आमने-सामने है | दोनों के   चालको को अपने-अपने कार्य की जल्दी है | एक कहता है, तुम पीछे हटो , मै निकलू | दूसरा कहता है, नहीं, तुम थोड़े पीछे हट जाओ, पहले मैं निकल जाता हूँ | इस मै-मै में दोनों अकड़कर खड़े है | दोनों कर्मशील तो है,दोनों को अपने-अपने कार्यो ...

हिंदी भाषा और अध्यात्मिक मूल्य

ह र वर्ष 14 सितम्बर को ‘हिंदी दिवस’ के रूप में मनाते आ रहे है | भाषा तो भाव और भावना की अभिव्यक्ति का एक माध्यम अथवा साधन हुआ करती है || हम लोग जैसे हिंदी को एक उच्च भाषा मानते है , वैसे ही हमें भावों और भावनाओ की अभिव्यक्ति की रीति उच्च ही अपनानी चाहिए | भाषा के ऊँचा होने का प्रमाण तो उसका प्रयोग करने वाले लोगो के जीवन की अथवा मानसिक स्थित एवं व्यवहार की ऊंचाई से मिलना चाहिए | हिंदी एक उच्च भाषा है परन्तु हमारा जीवन कितना उच्च है ? क्या हिंदी भाषा अथवा हिंदी साहित्य के द्वरा हमने अपने संस्कारो का दिव्यीकरण किया ? क्या हम प्रेम की भाषा अथवा एक-दूसरे के प्रति सम्मान की भाषा को सीखे ? क्या हमने अपने देश के आध्यात्मिक मूल्यों ( Spiritual Values ) तथा संस्कृति को, जिसका ही एक अंग यह भाषा है, अपने मन में गौरवमय स्थान दिया ? क्या हमारी दृष्टी में भाषा के साथ-साथ चरित्र और अनुशासन का ऊँचा स्थान है ? आज भारतवासियों में आपसी भेदभाव मनमुटाव क्यों? सोचने पर आप मानेंगे की इसका एक मात्र कारण यही है की वे अपने देश के पूर्वकाल के सर्वोत्कृष्ट इतिहास को, अपनी उच्च मर्यदा को, अपने यहाँ के स...

विवेक को नष्ट करता है क्रोध

  सं सार में करोड़पति है और रोडपति भी परन्तु उन दोनों में से उन्मादी है क्रोधपति | करोड़पति अहंकारी हो सकते है जबकि क्रोधपति परेशानियों का शिकार रहते है | यह सोचना तो करोड़पतियो का ही काम है कि करोड़ो कि सम्पति   के मालिक है या यह सम्पति उनकी मालिक | इसी तरह क्रोधपतियों को यह स्वयं विचार करना है कि क्रोध उनका पति है या वे क्रोध के? कुछ भी हो क्रोध है बुरा जिसके घर में इसका वास होता है, उसके खजाने खली हो जाते है| खजाने कौन-से ? सुख , शांति प्रेम , ख़ुशी व संतुष्टता    के| ये सर्वश्रेष्ठ खजाने है और यह क्रोध एक भयंकर भुत है जिसकी नजर इन्ही खजानों पर रहती है | अब सोच ले , आपको ये खजाने प्रिय है या आपका प्यार इस भूत से है? निर्णय शक्ति भ्रमित क्रोधी पापा के घर में प्रवेश करते ही बच्चे ऐसे ही दुबक जाते है जैसे बिल्ली को देखकर चुहे | यदि किसी के घर का बड़ा व्यक्ति क्रोध कि अग्नि में जलता है तो वहां कि खुशहाली जलकर नष्ट हो जाती है |   बच्चो कि बुद्धि का विकास रुक जाता है और अनेको का जीवन उदासी व निरासा के गहन अंधेरो में डूब जाता है | क्रोध का पहला बुरा परिणाम भु...

मानवता के विधान के विधाता

मानवता के विधान के विधाता  भारत की भूमि देवदूतो से भरी पड़ी है | हम ये नहीं कहते कि रामकृष्ण परमहंस , विवेकानंद जी व महर्षि दयानंद सरस्वती या अन्यानेक आत्माए महँ नहीं थी , महान थी , लेकिन एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने अपनी सम्पूर्ण संतति , संतान व सम्पति को एक सेकेण्ड में विश्व कल्याणार्थ समर्पित कर अपना नाम उन देवदूतो में लिखवाया जिसे स्रष्टि की शुरुआत होती है |   भारत की देवभूमि को हजारो ऋषिओं की तपस्थली का भी नाम देते है | उसी तपस्थली माउन्ट आबू राजस्थान है , जहाँ पर एक कालजयी व्यक्तित्व द्वारा विश्व नवनिर्माण का इतिहास परमात्मा ने रचा और उस व्यक्तित्व का नाम दिया प्रजापिता ब्रम्हा | जैसे प्रत्येक धर्म में कोई न कोई धर्म का प्रथम पुरोधा अवश्य होता है , वैसे ही सम्पूर्ण विश्व और उससे जुड़ीमानवता के अध्यात्मिक उत्थान हेतु परमत्मा ने हम सबको बीच से ही एक श्रेष्ठ मानव का चयन किया जो शांति और सदभाव को लेकर कार्य करता है | जब भी उसकी जीवनी लिखी जाति है तो उसके गुणों के बारे में जितना कुछ लोग कहते है उससे वह कही अधिक होता है | ऐसे ही मानव धर्म के मसीहा जिनका नाम चिरकाल तक ...

Labeles

Show more

Followers

Total Page Views