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 आप हिम्मत का एक कदम बढाओं तो परमात्मा की सम्पूर्ण मदद आपके साथ होगी !

भूतकाल में मत भटकिए



  हमें भूतकाल के बारे में कभी नहीं सोचना चाहिए,जो बीत गया सो बीत गया पिछले को कभी नहीं याद करना चाहिए | हमें वर्तमान को अच्छी तरह से सुधारना चाहिए, भविष्य अपने आप सुधर जायेगा क्योंकि वर्तमान सही है तो भविष्य सही ही रहेगा, आने वाले के बारे में नहीं सोचना चाहिए और जो बीत गया उसके बारे में कभी नहीं सोचना चाहिए | इसी तथ्य को स्पस्ट करते हुए आइये जानते है कि भूतकाल में क्यों नहीं भटकना चाहिए |
                               
 

जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा है, जो होगा वह बहुत अच्छा होगा | 
                     ओम शांति

                भूतकाल में मत भटकिए 

म में से कई आमतौर पर सुबह गुनगुना पानी पीते है | यदि थर्मस में पहले का ठंडा पानी पड़ा हो तो उसे फेककर नया पानी भरते है | यदि पुराने पानी पर नया पानी डाल दे तो नए कि गुनगुनाहट समाप्त होने कि सम्भावना रहती है |  विचार भी ऐसे ही है | यदि नए विचारो को मन में भरने से पहले पुराने विचारो से मन को खली ना करे तो नए विचारो के तरोताजापन में कमी आ जाती है | नए कि नवीनता और चमक तभी स्पष्ट दिख सकती है जब उसको पुराने के प्रभाव से बचाया जाए | यदि हम पुराने पानी को फेकना नहीं चाहते तो ऐसा कर सकते है कि उसे अलग से तोड़ा गर्म करके फिर इस नए में मिला ले तो नए जल कि गुनगुनाहट में अंतर नहीं आएगा | इसी प्रकार यदि पुराने विचारो को फेकना नहीं चाहते तो उन्हें भी नवीनता के रंग में रंग ले | फिर वे नए विचारो के साथ मेल- मिलाप कर लेंगे | यदि पुराने विचार भौतिक थे , सांसारिक थे विकारो में रेंज थे, तो उन्हें और उनसे जुडी घटनाओ, व्यक्तियो को आध्यात्मिक स्वरुप देकर उस नए रूप में देखना, जानना, व्यवहार करना शुरू कर दीजिये | इससे नए- पुराने का सामंजस्य स्थापित हो जायेगा | पीछे खीचने वाला भूतकाल ऊपर चढ़ने कि सीढ़ी बन जायेगा |
          
         आगे बढ़ने के लिए पिछला छोड़ना अनिवार्य है 

प्राप्त का जितना त्याग करेंगे, उतना आगे बढ़ेंगे | जैसे एक तैरक पानीको पीछे धकेलता जाता है और आगे बढ़ता है | हमें जो प्राप्त हो रहा है उस में खो ना जाये बल्कि उसे देकर, बांटकर आआगे बढ़ते जाये | जो प्राप्त है उसे पकड़कर बैठ गए तो वही जाम हो जायेंगे आगे नहीं बढ़ पाएंगे | 

यदि हमें छत पर जाना है और पहली सीढ़ी पर पैर रख लिया है तो यह जरुरी है कि उस पहली सीढ़ी का त्याग कर दे , तभी तो अगली तक पहुचेंगे | एक के बाद एक का त्याग करना ही होगा, तभी तो अगली तक पहुंचेंगे | एक के बाद एक का त्याग करना ही होगा , तभी छत पर पहुच पाएंगे अन्यथा वही यानि पहली सीढ़ी पर ही कहदे रहेंगे | ईश्वर कि ओर कदम बढ़ने में पुराने देह, देह के सम्बन्धो कि सीढिया तो छोडनी ही पड़ेगी | उन्हें पकड़े-पकड़े परमात्मा पिता को कैसे पकड़ पाएंगे | केवल सीढ़ी पर चढ़ने का ही नहीं, जमीन पर चलने का सामान्य नियम भी यही है | हम पिछला कदम उठाते है , उसके नीचे कि जमीन को छोड़ते है तब आगे बढ़ते है अतीत की अनावश्यक स्मृतियां ही वह जमीन है जिससे बुद्धि रुपी पाँव को हटाना जरुरी है |
                        
           लिखे हुए पर पुनः लिखना असम्भव

यदि हमारे पास अख़बार का या किसी किताब का ऐसा पन्ना है जिस के दोनों ओर गहरे-गहरे अक्षर लिखे हुए है तो उस भरे हुए कागज पर कुछ भी नया लिखना असम्भव होगा | पुरानी स्मृतियों से, पुराने संस्कारो से भरी आत्मा पर भी कुछ नया लिखना लगभग असम्भव  होता है इसलिए पुराने, अनावश्यक, नकारात्मक, अज्ञान से भरे कर्मो कि स्मृति को मिटाना परम आवश्यक है |
                         
            सार ग्रहण करे और आगे बढे 

जब हम कोई फल खाते या चूसते ई तो उसका गुदा (सार) हमारे पेट में चला जाता है और गुठली को फेक कर हम आगे बढ़ जाते है | क्या कुछ दूर जाकर हम उस फेकी हुई झूठी गुठली को उठाने आते है? नहीं जना | उसे तो सारहीन, व्यर्थ समझकर हम फेक चुके , फिर उससे मोह क्यों? भूतकाल भी ऐसा ही है | भूतकाल में जो हुआ उससे सीख ग्रहण करके, उससे सार ग्रहण करके ही तो हम यहाँ तक आये है, फिर पीछे मुड़-मुड़कर क्यों देख रहे है |
              
   चीजो कि तरह बाते भी हो जाती है प्रचलन से परे 

बहुत साडी बासी चीजे, पुरानी बाते हम बहुत जल्दी बदल लेते है या फेक देते है और ज़माने के साथ कदम से कदम मिलकर चलने का प्रयास करते है | एक जमाना था जब लोग रात का बना  बासी खाना खा लेते थे पर अब जान गए है कि ऐसे खाने से बीमारियाँ हो जाती है इसलिए उसे फेक देते है | पहले पीतल-कासी के बर्तनों में खाना खाया जाता था पर अब ये पुराने फैशन के बर्तन घरो से निकल चुके है और नए ज़माने के स्टील, कांच या प्लास्टिक के बने बर्तन घरो कि शोभा बड़ा रहे है माताएं- बहने जिन भरी-भरी घाघरो को पहनती थी अब वे भी कही नजर नहीं आते |उनका स्थान नए ज़माने के सलवार, कमीज \, पेंट, साड़ी ने ले लिया है | को आउट ऑफ़ फैशन मानकर उनसे पीछा छुड़ा लिया  है परन्तु सवाल यह है कि बातो का फैशन भी तो बदलता होगा, वे भी तो पुरानी होती होंगी | फिर हम उन पुरानी बातो और पुरानी स्मृतियों को क्यों छाती से चिपकाए बैठे है ? उन्हें भी पुराने ज़माने कि समझकर फेकिये और उनके स्थान पर नै स्मृतियो  को भर लीजिये |
जब हम छोटे थे, हमारे पहनने के कपडे छोटे-छोटे थे | हम बड़े हुए तो वे अपने आप छुट गए | अब कोई दिखाए तो भी मुस्कुराकर उनसे मुहं फेर लेते है | जैसे शरीर के बड़े होने पर बालपन के कपड़े छूट गए इसी प्रकार मन के अनुभवी, ज्ञानी, समझदार होने पर बालपन कि बाते, वे अनुभवहीन स्मृतियां, वे देहभानवश कि गई भूले भी तो पीछे छूट जानी चाहिए  और उनके स्थान पर आज कि मन स्थिति के अनुकूल ज्ञानयुक्त बाते स्मृति में रहनी चाहिए | उम्र के आगे बढ़ने के साथ-साथ ज्ञान और समझ भी तो विकसित होने चाहिए |
                       
             स्व परिवर्तन ही सही पश्चाताप है
  
कई बार भूतकाल कि कोई गलती हमें बार – बार कचोटती है | हमारा मन बार बार उस कि गई गलती वाले स्थान पर जा खड़ा होता है और गलती का पुनः स्मरण कर दुःख और पश्चाताप में डूबता है | परन्तु ऐसा करने से गलती ठीक में बदल जाती है क्या? माल लो हमारा पांव कीचड़ में डाल गया, कीचड़ में सन गया तो क्या हम पुनः कीचड़ के पास जाकर पांव को उसमे डालकर अफ़सोस करते  रहे कि हाय,पांव को कीचड़ लग गया या फिर जुटे और पांव से कीचड़ को पोछकर पहली स्थिति में आ जाये और सुकून महसूस करे |यदि कीचड़ सने पांव को स्मरण करेंगे तो दर्द झेलेंगे और पोछे हुए साफ़-सुथरे पांव को बार-बार देखेंगे तो आत्मविश्वास से भरेंगे | सही पश्चाताप है स्व का परिवर्तन कर लेना
                      
            मिटाए जा सकते है पुराने निशान 

कई लोग सवाल उठाते है कि गलती जब थी तब हम अनजान थे, समझ कि कमी थी, बाल बुद्धि थी, कर्मो कि गहन गति का ज्ञान नहीं था, आज जब समझ आई है तो वह कर्म गलत था,यह अहसास बार-बार हो रहा है, पर क्या उसे मिटाया जा सकता है ?क्या पड़े हुए निशान, लगाई गई  लकीरे मिटाए जा सकते है ? अध्यात्म कहता है, हाँ, ऐसा हो सकता है | परमात्मा कि यथार्त,एकरस, गहन स्मृति उन लकीरों और निशानों को मिटा सकती है | यदि साइंसके बल से किसी चीज,स्थान यहाँ तक कि व्यक्ति के रूप को भी बदला जा सकता है तो साइलेंस बल से भी पूर्व में किये गए कर्मो का रूपांतरण हो सकता है | उन कर्मो कि स्मृति के स्टाक को खली किया जा सकता है और उनके स्थान पर श्रेष्ठ कर्मो कि स्मृति को भरा जा सकता है| जैसे हाथो पर लगी गंदगी धोने से हाथो का कोई नुकसान नहीं होता इसी पप्रकार मन-बुद्धि में भरी पाप कर्मो कि स्मृति को विस्मृत करने और उसके स्थान पर श्रेष्ठ कर्मो कि स्मृति भरने से भी कोई नुकसान नहीं होता | भूतकाल मृत है और भविष्य अजन्मा है | जीवित तो केवल वर्तमान है | इसलिए किसी ने ठीक ही कहा है, गुजरे हुए का जिक्र न कर , आने वाले का फ़िक्र न कर,प्राप्त हुए का फख्र कर |

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प्रतिशोध और आत्मशोध

शोध शब्द का अर्थ होता है खोज परन्तु जब इस शब्द से पहले ‘प्रति’ अव्यय लग जाता है तो इसका अर्थ हो जाता है बदला | लेने वाला एक प्रकार से शोध (खोजबीन) तो करता है परन्तु वह सामने वाले की करता है |इस अर्थहीन खोज का उसे कोई मूल्य नहीं मिलता बल्कि वह अपने अमूल्य पालो को नष्ट कर देता है | मूल्य तब मिले जब वह प्रतिशोध की बजाय   आत्मशोध करे अर्थात स्वयं की जाँच करे | इससे उसके समय और शक्तियों पर व्यर्थ की आंच नहीं आएगी कीमती संकल्प हुए स्वाहा बदला शब्द भी हमें सन्देश दे रहा है कि हम क्या मांग रहे है ? बद माना बुरा और ला   माना लाओ | भावार्थ यही हुआ कि हम आह्वान   कर रहे है कि बुरे को हमारे पास ले आओ | जिसके भीतर बदला लेने की अग्नि सुलगती है उसे यह पता ही नहीं चलता की इसे सुलगाये रखने के लिए वह अपने कितने कीमती संकल्प ईधन के रूप में इसमें झोंक चूका है | झोकते रहने में महीनों और वर्षो गुजर जाते है | इस अन्तहीन निरर्थक प्रक्रिया में वचन और कर्म की शक्ति हां हास भी कम नहीं होता | बदले अपनी चाहना को किसी ने हमारी चाहना के प्रतिकूल व्यवहार किया और हम बदले पर उतारू ...

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