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 आप हिम्मत का एक कदम बढाओं तो परमात्मा की सम्पूर्ण मदद आपके साथ होगी !

हमारा क्रोध कही हमारा खतरा न बन जाए !



            

क्रोध को अंग्रेजी में कहते है – एंगर | एंगर कब डेंजर में बदल जाए पता ही नहीं चलता | क्रोध का दौरा जब पड़ता , व्यक्ति के मुख की आकृति इतनी भयंकर हो जाती है कि उसके मित्र तक सहम जाते है | लाल आंखे,टेढ़ी भ्रकुटी, फुले हुए नथुने,कांपते,होंट,भिचे दांत,मुंह से उगलते अंगार- क्रोधी व्यक्ति को देखते ही लगता है, मानो किसी ज्वालामुखी का धरसन हो रहा हो |
Ü क्रोध क्या है ? क्रोध भयावह है, क्रोध भयंकर है, क्रोध बहरा है, क्रोध गुणगा है, क्रोध विकलांग है | क्रोध की फुफकार अहं पर चोट लगने से उठती है | क्रोध करना पागलपन है,जिससे श्रेष्ठ संकल्पों का विनाश होता है | क्रोध में विवेक नष्ट हो जाता है |
Ü कहावत है की जिस घर में क्रोध होता है उस घर में पानी के घड़े भी सुख जाते है | परन्तु वास्तव में पानी तो क्या, क्रोधी मनुष्य का खून सुख जाता है | अतः मनुष्य को क्रोध नहीं करना चाहिए, बल्कि क्रोध का निरोध करना चाहिए |
Ü क्रोध मनुष्य को अनेक रूपों में सताता है | द्वेष,इर्ष्या,बदले की भावना, रुष्ट होना, हिंसा, वैर,विरोध की भावना, ये सभी क्रोध के ही भिन्न रूप है | देखा गया है कि प्रायः मतभेद से तंग आकर भी मनुष्य को क्रोध आ जाता है, जब दुसरे मनुष्य किसी के विचारो से सहमत नहीं होते तो उन्हें क्रोध का बुखार चढ़ने लगता है |
Ü सच में क्रोध एक तूफान है | कहते है किसी को बिना किसी हथियार के समाप्त करना हो, तो उसे क्रोध करना सिखा दो | वह इस प्रकार कह्तं होगा जैसे स्लो पोइजन लेने वाला धीरे-धीरे रोज मरता है | विशेषज्ञों के अनुसार क्रोध के दौरे से मस्तिष्ककी शक्ति का हास हो जाता है |
Ü एक बार क्रोध करने से हम 6 घंटे कार्य करने की क्षमता को खो देते है | यहाँ तक कि अनेकानेक भयंकर बीमारियों की चपेट में भी आ सकते है | क्रोध के कारण नस-नाड़ियों में विष की लहर सी दौड़ जाती है | एक नहीं, ऐसी अनेको घटनाएँ दर्ज है,एक माँ ने क्रोधावेश में जब शिशु को अपना दूध पिलाया तो शिशु की मृत्यु हो गई | क्योंकि वह दूध क्रोध के कारण जहरीला हो गया था | मोटे तौर पर कहे तो , 10 मिनट गुस्सा करके आप अपनी 600 मिनट की खुशियाँ खो बैठते है और वो ऐसे रूप रंग बनाकर रग-रग में बस जाता कि जवो निकलने का नाम ही नहीं लेता |

  क्रोध : इंसानी फितरत का वो हिस्सा है जो “बुद्धि” के चिराग को बुझा देता है |
   अब आप स्वयं ही आकलन कर देखे-क्या सामने वाले ने आपको इतनी हानि पहुंचाई थी जितनी आपने उस पर क्रोध करके स्वयं को पहुंचा डाली ?
     इसलिए याज्ञवल्क्य ने कहा है – ‘यदि तू हानि करने वाले पर क्रोध करता है, तो क्रोध पर ही क्रोध क्यों नहीं करता है जो सबसे अधिक हानि करने वाला है |’ तो हमें क्रोध पर क्रोध करने की करने की आवश्यकता है, अर्थात क्रोध को शांत कर देना |
   गीता में भी कहा गया कि काम क्रोध और लोभ यह तीनो नर्क के द्वार है | कामनाओं की पूर्ति न होने से क्रोध की उत्पत्ति होती है और क्रोध से बुद्धि का विवेक नष्ट हो जाता है और फिर वह अच्छे और बुरे के फर्क को नहीं समझ पाटा और अपने विनाश  की ओर अग्रसर हो जाता है |
   श्रीमदभगवद् गीता में कहा है कि क्रोध इन्सान के विवेक को विअसे ही ढक देता है जैसे धुन दर्पण को ढक देती है |

                  क्रोध आने के कुछ कारण :-

इच्छा के विपरीत कार्य होना :- हमारे अन्दर 30 से 40% क्रोध इसलिए होता है कि लोग हमारी इच्छा के विपरीत कार्य करते है |
अहम् के कारण :-  एक,अपने अहंकार के वशीभूत होकर व्यक्ति चाहता है कि सभी उसके नियंत्रण में रहे | जब ऐसी परिस्थिति नहीं बनती, तब उसे क्रोध आता है | दूसरा, कुछ लोगो का व्यक्तित्व ऐसा होता है कि जैसा मै कहूँ वैसा सब करे | ऐसे लोगो को बहुत गुस्सा आता है |
स्वभाव के वशीभूत  :- एक, कुछ लोग झूठ को सहन नहीं कर पाते है और गुस्सा कर बैठते है | उस समय यह सोचना चाहिए कि हमारे गुस्सा करने से कोई झूठ बोलना छोड़ देगा क्या ? दूसरा, अन्याय को सहन नहीं कर सकते है | यहं भी यह सोचना पड़ता है कि गुस्सा करने से न्याय मिल जाता है |
क्रोध का एक कारण यह भी है कि मनुष्य दूसरो की कमजोरी और भूल को देख कर उसे बर्दाश्त नहीं करता | परन्तु वास्तव में दूसरो की कमजोरियों और गलतियों को देखकर क्रोध नहीं करना चाहिए, बल्कि अपने क्रोध के संस्कार को देखकर अपनी कमजोरी और त्रुटी की ओर ध्यान देना चाहिए | कई बार हम सही हो, लेकीन कोई हमें गलत ठहराए, तब क्रोध आ जाता है |
जब अपमान होता है तब क्रोध आता है, जब नुकसान हो जाता है, तब क्रोध आता है |क्रोध आने कारण होता है जब हमारे अनुकूल परिस्थितियां नहीं होती जैसा हम चाहते है, या क्रोध हम उनके ऊपर करते है जिन्हें हम कमजोर समझते है, जिन्हें हम अपने से शक्तिशाली समझते है उन पर हम क्रोध नहीं करते |
जोकर से चाय के कप टूट जाएँ,तब क्रोध आ जाता है, लेकिन जमी के हाथो से टूटे तब ? वहां क्रोध कैसा कंट्रोल में रहता है, अर्थात बिलीफ पर ही आधारित है |
                           हो जाएँ सेक्योर...

कई बार हम जीवन में दूसरो द्वारा की जाने वाली इर्ष्या व् नकारात्मकता के शिकार हो जाते है | कोई न कोई किसी न किसी रूप में किसी के पीछे इर्ष्या की वर्षा करता रहता है | न जाने उसमे उनको कितना मज़ा आता है ! पर जिससे वो इर्ष्या करता है, यदि वो उसी नकारात्मकता के प्रभाव में आ जाता है तो उनका जीवन ही रसातल में चला जाता है | ऐसे आज अगर हम नकारात्मक बुराइयों के शिकार हुए लोगो की लिस्ट देखे तो इस दुनिया में ऐसे लोगू की कमी नहीं है | क्या वाकई कोई किसी के बारे में कोई बुरे करता है तो उनका जीवन प्रभावित होता है ? जरा जाने हम इसकी सच्चाई को .....
मान लीजिये कोई व्यक्ति किसी के व्यापार धंधे को चौपट करने के लिए रिष्य करता है, तो क्या जिससे इर्ष्या करता है उसका धंधा चौपट हो जाएगा ? कतई नहीं | लेकिन समझने जैसी बात यह है कि यदि उसके नकारात्मक प्रभाव को हमने उसी स्वरूप में स्वीकार किया हो, तब धंधा चौपट होने की सम्भावना बढ़ जाती है | वो कोई हमारे भाग्य के करता-धर्ता नहीं है | भाग्य तो हम अपने कर्मो से लिखते है | लेकिन फिर भी ऐसी चीजो पर विश्वास कर हम असुरक्षित (अनसेक्योर्ड) महसूस करने लग जाते है | वास्तव में किसी के द्वारा की गई इर्ष्या या नकारात्मकता को हमने अपने मन में स्थान नहीं दिया तो उससे हम अप्रभावित ही रहेंगे | लेकिन अगर उसके प्रभाव में आकर हमारी सोचने की प्रकिया को हम उसी अनुसार बनायेंगे तो अवश्य ही हम उसके शिकार हो जायेंगे |
कई बार जीवन में हम कुछ मन में बनाये मान्यताओं के आधार पर ही अपने को अनसेक्योर्ड फील करते है, जैसे हम कोई शुभ कार्य करने जाते है, और बिल्ली ने रास्ता काट दिया या किसी दुष्ट व्यक्ति का मुखड़ा देख लिया तो मन में संदेह उत्पन्न हो जाता कि अब वो मेरा कार्य तो बिगड़ना ही है, क्योंकि मैंने इसका मुखड़ा देख लिया, या इस बिल्ली ने मेरा रास्ता काटा | मन में ऐसा विचार आता है ना ? अगर हाँ, तो फिर वो हमारे परिणाम को प्रभावित करेगा ही | परन्तु समझने की बात है कि ना तो बिल्ली को पता होता है कि आप किसी शुभ कार्य के लिए जा रहे हो, और ना ही दुष्ट व्यक्ति के सामने आने का कोई कार्यक्रम तय होता है कि आपके कार्य को बिगाड़ दे | लेकिन ऐसी मनघडंत मान्यताओं के कारण हम ऐसा सोच लेते है और उसका प्रभाव हमारे मन में संदेह पैदा करता है और हम स्वयं को अनसेक्योर्ड फील करते है | वास्तव ऐसा होता तो आज घर में बिल्ली पालते ही क्यों ? सच तो यही है, हम जबतक उन विचारो को उसी रूप से स्थान नहीं देते, तब तक उनके बुरे प्रभाव से हमारे जीवन में कुछ भी प्रभावित नहीं हो सकता |
आजकल कई बार संगठन में कार्य करते हुए, या दफ्तरों में या कम्पनीज में कार्य करते है तो कई बार किसी के बारे में इर्ष्या के  शिकार हो जाते है | इर्ष्या करने वाला इर्ह्स्य क्यों करता है, क्योंकि वो समझता है कि मेरे से ये आगे  ना बढ़ जायें, या मेरा कम्फर्ट जोन जो मैंने बनाया हुआ है, उसमे कहीं मुस्किल ना पैदा हो जाए | वास्तव में, कोई किसी को अपनी स्किल, जितना जिसको जो आता है, उसको दूसरो को सिखाने से ही उसकी सेक्योरिटी बढती है, ना कि
 घटती है | जैसे कि कोई चाहता है कि मेरी स्किल मै उसको ना सिखाऊँ, तो मान लो उनकी स्किल पचास प्रतिशत है तो वो उतनी ही रहेगी,उससे आगे नहीं बढ़ेगी | लेकिन जब दूसरो को सिखायेंगे तो उसकी कुशलता में निखर आता जाएगा, कुशलता बढती जायेगी और जिसको सिखाएगा उसकी दुआएं भी मिलेंगी | जिससे उसके मन में शांति और ख़ुशी का ग्राफ ऊपर बढ़ता जाएगा | तो  आज कॉम्पटीशन  के जमाने में हम अपने जीवन में क्या ग्रहण करते है, उससे ही हमारे भाग्य का निर्माण होता है, ना कि दूसरे हमें बिराने की बात करके हमारा भाग्य बिगाड़ सकते है | तो आज से हमें श्रेष्ठ विचारो का निर्माण करने की कला सिख लेनी चाहिए , क्योंकि हमें अपने भाग्य का निर्माता स्वयं बनना है | हाँ, उसका तौर-तरीका है कि हम उन सभी नकारात्मक व् मन को दूषित करने वाली मान्यताओं से अपने मन को हटा ले | अर्थात् श्रेष्ठ संकल्पों की नीव द्वारा वर्तमान को सुन्दर और खुशनुमा बना ले | अपना मनोबल बढ़ने का सबसे सरल तरीका है सुबह सुबह अच्छे विचारो से अपने मन को पुष्ट व् सबल बनाये | साथ साथ सोने से पहले दिन भर के हुए बोझिल व व्यर्थ बातो को मन से मुक्त करे तथा स्रेस्थ व् कल्याणकारी विचारो से मन को श्रंगार कर परमात्मा की याद में सो जाए | तब ही हम अपने आप को सेक्योर्ड महसूस करेंगे और सुकून भरी जिन्दगी जी पाएंगे |

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Shivaratri celebrates God’s descent to destroy all evil

Life today has become very challenging and stressful. More than ever before, people are insecure and anxious about their future. As humans struggle to find solutions to the mounting problems,, it is evident that we need a higher wisdom and power to deal with the emerging crises. It is said in the scriptures that God comes at the time of extreme moral degradation. There is a very famous shloka in Bhagavad Gita; Yada yada hi dharmasya glanirbhawati bharat, abhyuthannam adharmasya tadatmanam srijamyaham” Lokking at the deteriorating condition of the world,we can realize that the time has come when God’s intervention is necessary to bring about a transformation in the world. Mahashivratri or shiv Jayanti is the most significant of all festivals, for it marks the descent of the Highest on high God Shiva in the human world to liberate human souls from sin and suffering and re-establish heaven or Satyuga on earth. The deep spiritual meaning of shivratri is that God descends on e...

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