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 आप हिम्मत का एक कदम बढाओं तो परमात्मा की सम्पूर्ण मदद आपके साथ होगी !

संस्कारित हो अपने बच्चे !


     

जैसा बीज होगा वैसा ही वृक्ष होगा वैसा ही उसका फल होगा | बच्चो में जैसे डालोगे संस्कार, वैसा ही बनेगा उसका विचार और वैसे ही पायेंगे उससे सद व्यव्हार |
अच्छे संस्कारों से संस्कारित बच्चे बचपन से अच्छे कार्यों में प्रवृत होकर माता-पिता की प्रतिष्ठा एवं स्वयं के शुभ भविष्य का कारण बनते है | चूँकि संस्कार की जड़े बचपन से जुड़ी होती है | बच्चो का दिमाग वह कोरा स्लेट होता है जिस पर हम जो चाहे लिख सकते है मनोवैज्ञानिक का मत है कि 10 वर्ष की उम्र के पहले तक बच्चो में तीन शक्तियाँ बहुत ही पावरफुल स्थिति में होती है | हम उनका पूरा पूरा उपयोग कर बच्चो का सर्वागीण विकास कर सकते है |
                       



विशेषकर माता पिता को 10 वर्ष की आयु तक सावधानी बरतनी चाहिए | बच्चो को संस्कारी बनाना है तो उन्हें उपदेश देकर हम नहीं सिखा सकते |  बच्चे वही सीखते है जो माता पिता को करते देखते है | हमें स्वयं के व्यवहारमें भी वही बाते अपनानी होंगी जो बच्चो के हित में हो | जैसे आपके गुण होंगे बच्चा वैसे ही सीखेगा | जो आप करते होंगे वैसा ही वो करेगा, जो सोचेंगे वह सोचेगा कि हम अपने पेरेंट्स से भी बढ़कर करे | अर्थात जैसा बच्चा देखता है तुरंत वैसा ही करता है इसीलिए आप उन गुणों को और  संस्कारों को अपने आप में पहले लाइए जिन गुणों व संस्कारो से आप बच्चो का श्रंगार करना चाहते है |
                          
                       



इसी उम्र में बच्चो को जो भी सिखायेंगे,जैसा सिखायेंगे वैसा ही वे ग्रहण कर लेते है | इसीलिए बच्चो को बहुत ही प्यार से धीरे से छोटे छोटे निर्देश देकर उनके व्यवहार में तबदीली लाई जा सकती है | और हर बच्चा अपने आप में अलग और अनोखा होता है | हो सकता है हमारे पड़ोसी का बच्चा पढाई लिकाही में बहुत अच्छा हो और हमारा बच्चा खेलकूद में | ऐसे में यदि बच्चा खेल में मैडल जीतकर आता है और पढाई में अंक कम लाता है तो हमें उसकी प्रशंसा करनी चाहिए और पढाई पर भी ध्यान देने के लिए उसको प्रेरित करना चाहिए | साथ ही उसकी इस विशेषता को आगे बढ़ने का प्रयास भी करना चाहिए | साथ ही उसकी इस विशेषता को आगे बढ़ने का प्रयास भी करना चाहिए | ताकि वह भविष्य में अच्छा खिलाडी बन सके |
                                  


इस उम्र में बच्चो में यह शक्ति बहुत पाई जात है ! घर का वातावरण ऐसा बनाइये कि वे कुछ रचनात्मक गतिविधियाँ कर सके निखरता है |बचपन एक ऐसा उम्र होता है जिसमे दिमाग अपने अन्दर वही चीजे स्टोर करता है, जमा करता है जो वह अपने आसपास के वातावरण में देखता है | उसके आसपास  ऐसा वातावरण बनाया जाए जिससे वे कुछ सिख सके | जैसे दीवारों पर लगे चित्र, घर की पुस्तक, घर में बजते गीत इत्यादि |
आपने देखा होगा, आज कितने ही बच्चे बड़े होने के बाद अपने माँ-बाप को घर से बाहर निकाल देते है, ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि माँ-बाप अपने बच्चो के बीच प्यार को नहीं जोड़ पाते | वह सिर्फ उनको पालते रहते है , कभी प्यार से पुचकारते भी नहीं | सिर्फ पालने से या खिलाने से आप कभी किसी दूसरे इन्सान का दिल नहीं  जीत सकते |
                   
             


आप अपना कीमती समय बच्चो के बीच में व्यतीत करे | अपने स्नेह के वायब्रेशंस उन्हें दीजिये | यही वक्त होता है जब एक बच्चा अपने  माँ बाप के साथ गहराई से जुड़ता है | तो उसको आपके साथ रहना घूमना फिरना बाते करना बाकी सब चीजों से ज्यादा अच्छी लगेगी | उसका यह प्यार पूरी जिन्दगी एक जैसा बना रहेगा, वह दिल से अपने माँ-बाप और दूसरे लोगो से प्यार करेगा और आदर भी |
यदि बचपन से कुछ कुसंगत में रहकर कुछ संस्कारो का बीजारोपण हो गया तो उसके जीवन में दुःख और असफलता ही रहेगी | इसलिए हमें अपने बच्चो की हर एक बात पर ध्यान देना होगा जैसे कि हमारा बच्चा कहाँ है और किसके साथ है | यदि जरा सी भी लापरवाही करते है और बच्चो की सांगत की तरफ लापरवाह होते है और वो गलत संगत में चला जाता है तो उसको बिगड़ते देर नहीं लगती | इसके लिए समय समय पर अपने बच्चे के स्कूल में जाकर यह जाना चाहिए कि वह पढाई कैसी कर रहा है और कैसे बच्चो के साथ उसकी दोस्ती है | जो भी हमारे महापुरुष व् महान आत्माएँ हो चुकी है, उनकी कहानियां,जीवनियाँ और संस्मरण सुनाइए | इससे उसका आत्मविश्वास जागृत होगी कि मुझे भी ऐसा बनना है |
बचपन से ही घर के वातावरण को सुसंस्कारित बनायें | उन्हें संस्कारित बनाने के लिए राजयोग मेडिटेशन स्वयं भी करे और उन्हें भी करायें | जिससे उनमे आत्मविश्वास की जागृति तो होगी ही, साथ साथ रचनात्मक कार्य करने का सहस बी उनमे बढेगा |

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