आज चारो
तरफ दुःख, अशांति, तनाव और बीमारियाँ बढती जा रही है | कोई भी सुखी दिखाई नहीं दे
रहा है | पापाचार,भ्रष्टाचार,दुराचार,अत्याचार की अति हो रही है |
धर्मसत्ता,राज्यसत्ता के नाम पर झगड़े ही झगड़े दिखाई दे रहे है | लूटमारी, ढोंगबाजी के साथ-साथ धर्म के नाम पर, समाज सेवा के नाम
पर बड़ा व्यापार तीव्र गति से बढ़ता जा रहा है | सम्प्रदायवाद बहत बढ़ गया है, लोग
अपना नाम प्रसिद्ध करने में हो लगे हुए है | अन्दर एक तो बाहर दूसरा होने के कारण
किसी का, किसी पर असर नहीं पड़ रहा है , चारो ओर पतन ही पतन है | धर्म बेचने की बोली
लग रही है, मान, शान चादर के चक्कर में हालते बिगड़ रही है | सभी तरफ स्वार्थ ही
स्वार्थ है | कोई आगे बढ़ रहा है तो उसे गिराने की सोच चल रही है |
देना पड़ेगा कर्मो का हिसाब
एक तरफ
जैसा कर्म वैसा फल बता रहे है तो दूसरी तरफ जादू-मन्त्र-तन्त्र-भविष्य-वस्तुशास्त्र
में अटके हुए है , औरो को दरकार कमी कर रहे है | ठगी में उस्ताद बने हुए है | मरने
के बाद ‘स्वर्ग पधारा’ कहते है तो रोना किस बात का ? सभी नियमो का उल्लंघन हो चूका
है | ना मंदिर,सुरक्षित ना मंदिर की मूर्ति सुरक्षित,चारो तरफ पहरा ही पहरा लगा
हुआ है | व्यसन-फैशन बढ़ रहे है | पासे कमाने के लिए देह का प्रदर्शन हो रहा है |
घर-घर में बँटवारे, खून,झगड़े, कोर्ट-केस चल रहे है | भाई-भाई दुश्मन बन गए है |
जन्म देने वाले माँ-बाप को आश्रम का रास्ता दिखाया है और बड़ी-बड़ी तीर्थयात्रायें
कर, बड़े-बड़े मंदिर बनाकर,थोड़ा-सा दान-पुण्य कर स्वयं को धर्मात्मा कहाने की कोशिश
कर रहे है | कर्मो का हिसाब-किताब तो उन्हें देना ही पड़ेगा |
क्या
यही जीना है ?
खान-पान
की पवित्रता का पूरा सत्यानाश हो गया है | घर की रोटी विष बन गई है , बहार का खाना
अमृत बन गया है | पेटी भरने के लिए रात-दिन भाग रहे है इससे पेट की बीमारी बढ़ गई
है | रात को सुख की, चैन की नींद नहीं,नींद की गोली लेनी पड़ रही है | धर्म करने के
लिए फुर्सत नहीं, क्या यह सुख है ? क्या यही जीना है ? क्या यही आनद, प्रेम, शांति
है ? साल में एक दिन धर्म का महोत्सव मनाकर,गंगा में दुबकी लगाकर, तीर्थयात्रा
करके, किया हुआ पाप मिटेगा क्या ? ‘अकेला आया, अकेला जाना’ यह केवल लिखत रह गई है
| दशहरे पर रावण को जलाने की कोशिश करते है लेकिन घर-घर में रावण अर्थात् काम,क्रोध,
लोभ,मोह,अहंकार बढ़ते ही जा रहे है | बड़ी-बड़ी समस्याएँ आ रही है लेकिन जागृत होने
का नाम नहीं, कुंभकर्ण की नींद में है |
सर्वश्रेष्ठ है प्रभु की शरण
इसी महाभयानक समय में गीता-ज्ञानदाता का दिया हुआ वचन ‘यदा-यदा ही धर्मस्य....’ याद करे | वह समय अभी चल रहा है | अपना दिया हुआ वायदा पूरा करने वे अब इस धरती पर पधारे है | यह खुशखबरी सभी मनुष्य आत्माओं के लिए, सभी धर्म वाले के लिए है | भगवान किसी माता के गर्भ से जन्म नहीं लेते, वे तो स्वयंभू है इसलिए उनका अवतार या अवतरण होता है और वह हुआ भी है | अब जल्दी ही महापरिवर्तन होने वाला है | भगवान कोई देहधारी नहीं, वे तो निराकार ज्योतिबिंदु शिव परमात्मा है | वही सबके मालिक है | वही दुखहर्ता-सुखकर्ता, भोलानाथ है, सबको मुक्ति-जीवनमुक्ति देने वाले अमरनाथ है | परमपिता-परमात्मा का परिवर्तन का कार्य पुरे विश्व में तेजी से चल रहा है | सतयुग की स्थापना के लिए पुरे विश्व में उन्होंने प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की शाखाओं की स्थापना की है जिनमे राजयोग द्वारा कौड़ी जैसा जन्म हीरे जैसा बनता है | यह ताकत सिर्फ उस प्रभु में ही है | उनकी शरण ही श्रेष्ठ शरण है, बाकी कोई उपाय बचा नहीं | साड़ी बातो की विस्तृत जानकारी और अपना भाग्य बनाने के लिए बिना मूल्य लेकिन बहुमूल्य भावभरा आमंत्रण है कि नजदीकी सेवाकेंद्र से अवश्य संपर्क करे
ओम शान्ति
Comments
Post a Comment