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 आप हिम्मत का एक कदम बढाओं तो परमात्मा की सम्पूर्ण मदद आपके साथ होगी !

एक अदभुत उड़ान



            एक अदभुत उड़ान

एक सुखद अहसास, एक सुखद मंजिल | एक स्थान से एक साथ कई पंछी बड़ी तीव्रगति से उड़न भरने की तैयारी में थे | बस, उनको कमांडर से आदेश मिलने की देती थी | फिर क्या था, कमांडर ने उन सभी पंछियों का बड़े ही सुन्दर ढंग से अभिवादन, अभिनन्दन किया और सभी पंछी एक साथ पुरे वेग से अपना स्थान छोड़ते हुए नीलेआकाश की ऊँचाइयों तक पहुँचे जा रहे थे | धरती की चमक,आकर्षण से दूर होते नजर आ रहे थे | उन सभी पंछियों को एक गंतव्य स्थान तक पहुचना था | कुछ पंछी बिना किसी को देके गंतव्य पर पंहुचने में सफल हो रहे थे, कुछ कभी अपनी रफ़्तार को देखते तो कभी दूसरे उड़ते हुए पंछियों को |इस कारण उनकी उड़ान कभी तेज तो कभी मंद पड़ रही थी | कुछ पंछी उड़ते-उड़ते न जाने किस मज़बूरी के कारण आचानक ही धरती पर वापिस उतर रहे थे जबकि वे नहीं चाहते थे कि वे मंजिल को छोड़ धरती के दायरे में उतरें परन्तु वे तीव्रगति से जिचे उतरते ही जा रहे थे ! उतरते ही जा रहे थे !!
उतरने वाले पंछी पुरे वेग के साथ उतरते जा रहे थे | अब उनका उतरना थम चुका था क्योंकि अब वे पूर्ण रूप से धरती की पकड़ में थे | वे उड़ने का भरसक प्रयास कर रहे थे लेकिन अपने को कमजोर महसूस कर रहे थे | उनको धरती की पकड़ में काफी पीड़ा महसूस हो रही थी | वे उड़ने की कोशिश करते लेकिन गिर जाते , बार-बार का प्रयास, बार-बार गिरना, बार-बार का संभलना  उनको बड़ा हैरान कर रहा था | अचानक ही उनके आजू-बाजू में एक मीठी मधुर आवाज गूंजने लगी..... “आप तो होलिहंस हो, आप तो सदा ही उड़ने वाले स्वतंत्र पंछी हो | उड़ते रहो, उड़ते रहो,उड़ते रहो, | आपको कोई बांध नहीं सकता | आपको किसी ने नहीं बांध रखा है |आप मुक्त हो | अपनी मंजिल तय करो, आप पूरे वेग के साथ उडो | अगर अभी पूरे
 वेग के साथ नहीं उड़े तो मंजिल पर कभी नहीं पहुँच सकोगे | फिर से शैतान के चंगुल में फंस जाओगे और मारे जाओगे | इसलिए पूरे वेग से उड़ो | मै कह रहा हूँ कि उड़ो, आपको कोई बांधने वाला नहीं, यह आपके मन का भ्रम है कि आपको किसी ने बांध रखा है अथवा आप किसी बंधन में है |’’ यह आवाज उनके आस-पास सूक्ष्म रूप से गूंज रही थी |
इस मधुर ध्वनि की तरंगे अन्तर्मन को बार-बार छु रही थी,अचानक ही उनके अन्दर एक करंट-सा आया और वे अब धीरे-धीरे धरती से उड़ने का प्रयास करते-करते,देखते ही देखते नील आकाश की ऊँचाइयों में ओझल हो गए | एक आश्चर्यवत  घटना हुई कि उनसे पहले उड़ने वाले पंछी अब उनसे काफी पीछे रह चुके थे और वे अपनी इस अदभुत उड़ान पर बड़े ही आनन्दित हो रहे थे , उनकी इस उड़ान में बीच-बीच में फिर वही ध्वनि सुने पद रही थी, “आओ, मेरे नैनों के नुरे रत्नों,आओ, आपका बहुत-बहुत स्वागत है, स्वागत है |” आश्चर्य,महँ आश्चर्य ! कैसी अदभुत उड़ान ! कैसा अदभुत सफरनामा !
आप समझ चुके होंगे कि इस अदभुत उड़ान के पीछे क्या रहस्य छिपा है | अभी पुरुषोत्तम संगमयुग में परमपिता परमात्मा शिव बाबा ने हम आत्म-पंछियों को एक लक्ष्य दिया है, वह है, शिव बाबा के स्वभाव , बन, कर्तव्य में अपने को समान बनाना | यही हमारे पुरुषार्थ की सम्पूर्ण मंजिल है | हम आत्म-पंछी उसी मंजिल की ओर रोज-रोज पुरे वेग से उड़ान भर रहे है | कई आत्म-पंछी तो शिव बाबा समान बन चुके है,कुछ आत्म-पंछियों में थोड़ी-सी कसरअभी भी बाकी रही हुई है, कुछ अधिक वेग से उड़ान पर है, मंजिल को प्राप्त करने की आशाएं उनके दिल में समाई पड़ी है | लगता है, वे भी जल्दी ही अपनी मंजिल को प्राप्त कर जायेंगे | कुछ पंछी अभी भी देह, देह के पदार्थ, रसनाएँ, देह के संकल्प, स्वभाव,संस्कार की धरनी को पकड़े हुए है | वे इन सबको छोड़ने का पूरा प्रयास कर रहे है, बहुत कुछ छोड़ पाने में सफल भी हो चुके है लेकिन अभी भी कुछ बाकी रह गया है | उसके छुटने की कशमकश चल रही है | वे सोचते है कि हमको धरती ने पकड़ रखा है, वे उड़ना भी छह रहे है लेकिन धरती के आकर्षण को छोड़ना नहीं चाह रहे है | उन आत्म-पंछियों को वही मधुर-मधुर धुन सुनाई देती है – “ मेरे मीठे बच्चो,आओ, जल्दी-जल्दी उड़कर मेरे पास आ जाओ |’’ आह्वान का यह गीत ब्रह्मा बाप वतन में बैठे-बैठे गा रहे है | शिव बाबा कह रहे है कि बच्चे,छोड़ो तो छुटो,छोड़ो तो छुटो |
इस आवाज को कुछ आत्म-पंछियों ने बार-बार सुना तो छोड़ दिया धरती की खिचावट को और अपने मन-बुद्धि से मंजिल की ओर उड़ चले | शरीर में होते हुए भी विदेही स्थिति द्वारा सूक्ष्म लोक,ब्रह्मलोक की उड़ान भर रहे है | इसी उड़ान में उनकी मंजिल समाई पड़ी है | ऐसा उनका अपना निश्चय व विश्वास कहता है |
तो आओ आप और हम सभी मिलकर अब उड़ चले, समय कह रहा है , प्रकृति कह रही है, भक्त आत्माएं कह रही है, प्रकृतिपति शिव बाबा भी कह रहे है | बच्चे अब तो अपने सर्व बन्धनों से मुक्त करो और मेरी पलकों पर बैठ उड़ चलो | यह समय तीव्र वेग से उड़ने का है, चलने का समय गया,जम्प लगाने का भी समय गया, अब तो तीव्र गति से उड़ने का समय है, तभी मंजिल पर पहुँच पाएंगे |” हमसे आगे अभूत आत्म-पंछी निकल चुके है, अब जल्दी ही समापन होने वाला है | ऐसी घड़ी में हम कही अटके, लटके, भटके हुए तो नहीं है ? नहीं, नहीं | हिम्मत मत हारो, स्वयं प्रक्रतिपति मालिक आपके साथ है, वे स्वयं कह रहे है कि जब मैंने आप सबको अपनी संतान के रूप में स्वीकार किया है तो जो भी हो, जैसे भी हो, आप मेरे हो, मई करोड़ो भुजाओं वाला सदैव आपके साथ हूँ,आप हिम्मत मत हारो | आप फिकर किस बात की करते हो ? बाबा कहते है, “ बच्चे, घबराओ नहीं, अपने को सर्व बन्धनों से मुक्त करो और अन्य आत्माओं को भी मुक्त होने में सहयोग करो |” अब यह रेस भी समाप्ति के कगार पर है , कही ऐसा न हो की सभी आगे चले जाएँ और हम पीछे रह जाएँ | वर्तमान समय बाबा की मुरलियां बहुत शार्ट और राजो भरी चल रही है जिनको गहरे से समझने की बहुत ही आवश्यकता है | वर्तमान समय बाबा से मिलन के समय जब कई बार बाबा एक ही शब्द को बार-बार अंडरलाइन करते है तो कई समझते है कि बाबा, एक ही बात को बार-बार रिपीट कर रहे है | नहीं, ऐसा नहीं है | बाबा एक ही बात को रिपीट नहीं कर रहे है बल्कि अभ्यास करा रहे है, हमारे ध्यान पर ला रहे है और कह रहे है कि बच्चे, आपके दिल में कौन ? मेरे दिल में तो आप भाग्यशाली बच्चे हो, जिन्होंने मुझ साधरण रूप में आये हुए परमात्मा पिता को पहचान लिया |
लेकिन अभी हम अपने दिल को चेक करे कि वहां कौन ? स्थूल बाते, व्यर्थ की कचरा-पट्टी की बाते, इधर उधर के व्यर्थ समाचारों के लेन-देन की बाते, तेरी-मेरी की बाते, स्थूल समाप्ति के लेन-देन की बाते, मोबाइल-कंप्यूटर-इन्टरनेट में व्यर्थ अपने को उलझाएँ रखने की बाते | और भी बहुत साड़ी बाते है जिनके कारण पुरुषोत्तम संगमयुगी ब्राह्मणों का समय व्यर्थ जा रहा है, इअसे ही व्यर्थ जाने वाले समय को बचाने की आवश्यकता है |
हम चेक करे- आज वो खुमारी कहाँ गई ? जब हम शुरू-शुरू में ज्ञान में आये थे और घंटो- बैठ योगाभ्यास किया करते थे, वो नशा,वो न्यारापन,प्रभु के प्रेम में दुबे हुए वो नैन-चैन वो एकांत और एकाग्रता का अभ्यास, वो देह से अलग होने का अभ्यास, वो त्याग- तपस्या  की लहर,अतीन्द्रिय सुख-चैन की बंसी आज कहाँ गम हो गई ? इस सहूलियत भरी दुनिया में अपने को सहूलियतो से इतना भर दिया है कि कही भी सहन करने की, त्याग करने की, परेशानी को झेलने की जैसे कि आदत ही ख़त्म हो गई है | जरा-सी भी परेशानी हुई नहीं कि आत्मा का चिल्लाना-चीखना चालू,सब्र का बांध जैसे कि टूट गया हो, अन्दर की सूक्ष्म स्थिति का क्या हाल होता है, हम सभी अच्छी तरह से परिचित है | फिर आने वाले भयानक समय का सामना कैसे कर सकेंगे ? क्या ऐसा संभव नहीं हो सकता कि  सप्ताह में एक दिन के लये ही सही, टोटल कंप्यूटर,इन्टरनेट,मोबाइल बंद रखे जा सके और उस दिन प्यारे प्रभु की दिव्य स्म्रतियों में अपने को डुबो सके, और ये भी संभव न हो तो कम से कम सप्ताह में एक दिन कंप्यूटर और इन्टरनेट तो बंद रख ही सकते है, क्या विचार है आपका इस सन्दर्भ में !!!
दिल में एक दिलाराम शिव बाबा की मधुर स्मृति की बजाय जब इस प्रकार की व्यर्थ स्मृतियाँ होंगी तो आत्मा की गति क्या होगी ? अन्त-मते-सो-गते अर्थात.......... !!!
अभी अपने को एकांत और एकग्रता की बहुत ही आवश्यकता है, ब्रह्ममुखता से अन्तर्मुखता की बहुत आवश्यकता है, अपने विचारो को नया मोड़, सकरात्मक मोड़ देने की आवश्यकता है, सहनशक्ति को बढ़ने की आवश्यकता है , एक सकारात्मक, शक्तिशाली संकल्प में अपने को लम्बे समय तक टिकने की आवश्यकता है जिसके द्वारा हम आत्म-अन्वेषण कर सके और उस महान लक्ष्य, महान मंजिल को प्राप्त करे जिसके लिए शिव बाबा और ब्रह्मा बाबा हम सभी ब्राह्मण कुलभूषणों पर वर्षो से म्हणत कर रहे है अन्यथा वो सपना,सपना ही रह जायेगा | फिर शायद दिल से यही निकलेगा कि दिल के अरमां,आंशुओं में बह गए,इस दिल के टुकड़े हजार हए, एक कही गिरा तो दूसरा कही गिरा | फिर तो शायद दिन और रात अँधेरे के समान ही लगेंगे और दिल छटपटायेगा कि अभी उजाला क्यों नहीं हो रहा है !!! शायद अपनी छाती भी पीट कर रोना पड़े | इसलिए भगवान् की श्रेष्ठ मत पर चलो |

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