इस संसार में
दो प्रकार के लोग है, एक है ‘देव’ और दुसरे है ‘लेव’ | ‘देव’ वे है जिन्होंने समाज
को दिया है और इन ‘देव’ लोगो ने यदि किसी
से लिया भी है तो उसके प्रति कृतज्ञ रहे है, उनका ऋण माना है और उसे चुकता करने के
लिये कई गुना श्रेष्ठ कर्म किये है | लेव वे होते है जो मात्र पेट भरने के लिए
पैदा होते है और पेट भरते-भरते संसार से चले जाते है |
भारतीय
संस्कृति आदिकाल से देव संस्कृति है | इस संस्कृति का उद्घोष है कि हम ले कम और दे
ज्यादा | देने की भावना को लेकर ही द्वापरयुग से यज्ञ, हवं आदि की प्रथा प्रारम्भ
हुई | यज्ञ क्यों किया जाता है ? इसलिए कि ऋषि-मुनियों की यह भावना रही कि हमने
प्रकृति से प्राणवायु ली है जिसने हमें जिन्दा रखा है | हमने अच्छी वायु लेकर
गन्दी वायु वातावरण को दी है | इसका ऋण कैसे उतरे? इसके लिए सोचा गया कि सारे
संसार की वायु को सुगन्धित बनाने के लिए घी को अग्नि में होम कर दिया जाए |
घी की खुशबु वाली हवा वातावरण में घुलेगी
तो प्राणियों के शरीरी पुष्ट होंगे रोगों का निवारण होगा और हम प्रकृति के ऋण से
उऋण होंगे | राजयोग भी मानसिक यज्ञ में समान है जिस द्वारा हम मन के शुभ विचारो के
प्रकम्पन सारे विश्व में फैलाते है | हवा द्वारा खुशबू फ़ैलाने से भी तीव्र गति से
ये शुभ संकल्प फ़ैल कर जड़-चेतन का शुद्धिकरण करते है |
सारी स्रष्टि
का संचालन देने की भावना से होता है | जमीं पानी लेकर अन्न, फल, सब्जी घास, उगती
है | इन्ही के आधार से हम जिन्दा है | बादलो का दिया हुआ पानी नदियों में भरा,
नदियों ने उसे बहने दिया और वह समुद्र में चला गया | इस प्रकार समुद्र, से बादलो
में , बादलो से जमीन पर, जमीन से नदियों में,
नदियों से समुद्र में.... यह चक्र सतत चलता रहता है | इसी सतत प्रवाह पर दुनिया
टिकी हुई है | आश्चर्य की बात देखिये, जब बादल समुद्र से जल लेकर भर जाता है तो
काला हो जाता है किन्तु जब जल का दान देकर खली हो जाता है तो सफ़ेद हो जाता है |
लेने और देने की भावना का यह अन्दर, हमें देकर उजाला रहने की प्रेरणा देता है |
रामचरित मानस में लिखा है -
संत,बिटप,सरिता, गिरि,धरनी,
परहित हेतु सबन्ह कै करनी |
भावार्थ- है कि
संत, वृक्ष,नदी, पर्वत और पृथ्वी – इन सबकी क्रिया दुसरे के हित के लिए ही होती है
| मानव शरीर भी देने की भावना के आधार पर चल रहा है | हाथ कमाते है, पर क्या हाथ
खाते है ? नहीं, मुख से खाया |खाकर क्या मुख ने अपने पास रखा ? नहीं, चबाकर पेट को
दिया | क्या पेट ने जमा किया ? नहीं | खून बनाकर पेट ह्रदय में भेज दिया | ह्रदय
ने उसे नाड़ियों में भेज दिया, नदियों ने सारे शरीर में फैला दिया,इस प्रकार हाथ के
पास भी रक्त आया और घूम-फिर कर रक्त सारे शरीर में चला गया | भक्ति मार्ग के
शास्त्रों में ब्राह्मण को देता कहा गया है | ब्राह्मण वही है जो लेता कम और देता
ज्यादा है | थोड़ा खाया, थोड़ा पहना, थोड़ी जगह में रहा और अपना सारा समय,
शक्ति,सम्पत्ति समाज के कल्याण में लगे इसलिए वह देवता समान है |
जितना-जितना हम
अपने आत्मस्वरूप में टिकते जाते है, देने की भावना बलवती होती जाती है | शरीर तो
किराये का मकान है | हम जानते है कोई किरायेदार,किराये के मकान की सजावट पर अपना
धारण खर्च नहीं करता | उसे अन्दर स्मृति रहती है कि क्या पता यह कब छूट जाए, मै क्यों समय, संपत्ति इस पर लुटाऊँ | जो
करना होगा, इसका मालिक करेगा | इसी प्रकार आत्माभिमानी व्यक्ति इस शरीर को किराये
का मकान मानता है और इसकी सुन्दरता के लिए समय, शक्ति और धन खर्च नहीं करता |
सादा जीवन,कम खर्च, अधिकतम परोपकार – यही
उसका लक्ष्य रहता है |
लालच बुरी बला है
लेने की भावना
लालची बनाती है | एक बार एक गरीब व्यक्ति अपने अमीर पडोसी से चांदी के चार बर्तन
उधर ले आया और लौटते समय दो चम्मच भी उन बर्तनों में दाल दिये | अमीर ने जब दो
चम्मचों के बारे में पूछा तो गरीब कहने लगा, इन चार बर्तनों ने दो बच्चो को जन्म
दिया है | अमीर ने चुपचाप बर्तन रख लिए | कुछ दिनों बाद गरीब को फिर बर्तनों की
जरुरत पड़ी | इस बार अमीर ने उसे सोने के बर्तन दे दिए इस लालच में कि इस बार भी
बढ़े हुए बर्तन मिलेंगे | परन्तु कई दिनों तक गरीब व्यक्ति बर्तन लौटने नहीं आया तो
अमीर ने कारण पूछा | गरीब ने कहा, आपने बर्तन मर गए | यह सुन अमीर को गुस्सा आया
और न्यायालय में पहुच गया | न्यायाधीश ने भी फैसला गरीब के हक़ में देते हुए कहा,
जो बर्तन बच्चे जन सकते है, वे मर भी सकते है | अमीर व्यक्ति को नुकसान उठाना पड़ा
| इसलिए कहा जाता है , लालच बुरी बला | निर्लोभी सदा सुखी रहता है | लोभ कई रूपों
स\में हमारे सामने आता है | हमें फंसाने की कोशिश करता है | हम सावधान रहे, हमें
देवता बनना है, लेवता नहीं |
छोटी
लाइन में लगे
देने वास्तव
में देना नहीं, लेना होता है और लेना, लेना नहीं वास्तव में देना होता है | दिया
हुआ वापस लौटेगा | हर किया की तुरंत समान और विरोधी प्रतिक्रिया होती है | हम गेंद
को जमीं पर मारते है और वह उसी वेग से, उसी समय वापस लौटती है, हमारे न चाहने पर
भी ऐसा होता है | हम गाय को, कुत्ते को रोटी देते , चींटियो को आटा डालते ,
पक्षियों को पानी पिलाते, क्या उनसे तुरंत बदला मांगते है ? नहीं ना | हम जानते
है, हम इनके लिए जो करेंगे उसके बदले हमें भगवान देगा | हम किसी के बच्चे के
जन्मदिन पर कोई उपहार लेकर गए,उस उपहार को पाकर ख़ुशी और धन्यवाद बच्चा प्रकट नहीं
करता, बच्चे के माता-पिता करते है और मौका मिलने पर वे बदला (रिटर्न) भी अवश्य
देंगे | इसी प्रकार हम भी नेकी करते है तो उसका फल वो देगा | मानव यदि देगा तो
अपनी हैसियत अनुसार देगा पर परमात्मा तो न्यायकारी है, कर्म की गुणवत्ता अनुसार
देगा वो समर्थ है और हमें गर्व है कि उसने हमें देने वाले की लाइन में लगाया, नहीं
तो संसार में मांगने वालो की बहुत लम्बी कतार है | डाटा-पण की भावना वाले तो गिने-
चुने होते है | हम कौन-सी लाइन में लग्न चाहते है ? वैसे तो हम हमेशा छोटी लाइन का
चुनाव करते है चाहे प्लेटफार्म पर टिकट लेनी हो, कोई बिल भरना हो, टोल नाके पर टोल
देना हो, तो फिर अब भी छोटी लाइन में लगे, दाता बने |
भगवान बनना चाहता है
दाताओं का पिता
एक बार एक
व्यक्ति कार साफ कर रहा था | एक व्यक्ति पास से गुजरा, पूछा गाड़ी किसकी है ? उसने
उत्तर दिया, मेरे भाई की है, उसने मुझे दी है | व्यक्ति ने एक लम्बी साँस ली और
कहा, काश! मेरा भी ऐसा भाई होता | तभी एक दूसरा व्यक्ति वहां से गुजरा, उसने भी
वही सवाल पूछा और कार साफ करने वाले ने वही उत्तर दोहरा दिया | इस दुसरे व्यक्ति
के मुख से निकला, काश! वो भाई मै होता | हम पहले व्यक्ति जैसे बने या दुसरे जैसे,
यह हमारे ऊपर है | भगवान हमेशा दाताओं का पिता बनना चाहता है |
भगवान शिव कहते
है –
“ अब मास्टर दाता बनो | बाप से लिया है
और लेते भी रहो लेकिन आत्माओं से लेने की भावना नहीं रखो | यह बदले तो मै बदलूँ,
यह लेने की भावना है | ऐसा हो तो ऐसा हो | यह लेने की भावनाएं है | ऐसा हो, नहीं ,
ऐसा करके दिखाना है | हो जाये तो, नहीं होना ही है और मुझे करना है | मुझे
वायब्रेशन देना है | फ्राक दिल बनो | देते रहो | महासहयोगी बनो, महादाता बनो |”
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