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 आप हिम्मत का एक कदम बढाओं तो परमात्मा की सम्पूर्ण मदद आपके साथ होगी !

इन्सान क्यों झूठ बोलता है !

हमें झूठ तो बिल्कुल ही नही बोलना चाहिए क्योंकि हर काम झूठ से ही नहीं होते है, हमारा स्वधर्म झूठ बोलना नहीं है न ही किसी को झूठ में फ़साना है, न किसी को धोका देना है | जिन्दगी के पल थोड़े है और हमें परिवर्तन भी करना है इसलिए हमें सच्चाई का साथ रहना है, आइये जानते है की इन्सान इतना क्यों झूठ बोलता है, किस लिए बोलता है, और क्यों बोलता है |

                                                   



आदमी क्यों झूठ बोलता है ? हम अभय और निर्भयता की बात करते है | सबसे बड़ा भय यह है कि हम सच ही नहीं बोलते | आज का मानव न केवल झूठ बोलता है, बल्कि उसका व्यवहार भी सच पर आधारित नहीं है | न्यायलय में भी न्याय मिलने के लिए सत्य बोलने की जरूरत है | अगर सच नहीं बोला जाएगा तो न्याय कैसे होगा ? जज कैसे समझेगा ? एक चालक वकील केस अपने हक़ में बनाकर अपनी तरफ फैसला करा देगा, या जज को पैसे ख्लाके अपना काम करा लेगा | वहां न्याय होगा या अन्याय होगा ? लोग कहते है कि अरे भाई, अभी कलियुग है, आजकल न्यायालयो में भी न्याय कहा होता है ! जब तक सत्य नहीं बोला जाएगा, न्याय कैसे होगा, इसी तरीके से हमारे जीवन में सत्य नहीं होगा,संकल्प में भी सत्य नहीं होगा,वाणी और कर्म में तो बात में आता है, तो कैसे आएगा ? अगर हम किसी के बारे में सच नहीं बोल रहे है तो इसका अर्थ है कि उसके बारे में हमारे मन में इर्ष्या है, घ्रणा है, द्वेष है, हम उस व्यक्ति को बड़ो की नजर से गिरना चाहते है, हम उस व्यक्ति से कोई बदला लेना चाहते है, ऐसे थोड़ेही कोई किसी के बारे में झूठ बोल देता है | झूठ बोलने से उनको जरुर फायदा होता है, चाहे थोड़े से समय के लिए क्यों ना हो | वास्तव में फायदा नहीं होगा,होगा तो बेडा गर्क | नुक्सान होगा, लेकिन समझते है कि इससे कुछ फ़ायदा होगा | ये बाल बुद्धि है, अबोध बुद्धि है | जैसे कोई बच्चा ब्लेड को खिलौना समझकर खेले तो अपना ही हाथ काट बैठेगा | ऐसे ही वकील अपने क्लाइंट के लिए झूठ बोलता है, बिजनेसमैन अपने बिजनेस के लिए झूठ बोलता है, हम फायदे के लिए झूठ बोलते है, लेकिन झूठ बोलने वाले वही के वही रह जाते है | उनमे कोई परिवर्तन नहीं होता, जिन्दगी भर उन संस्कारो को और प्रगाढ़ बनाए जाता है | हम परिवर्तन की बात करते है, लेकिन कहाँ से परिवर्तन होगा ! परिवर्तन की पहली सीढ़ी पर ही हम नहीं चढ़े |

             

क्या हमारे में इतनी भी नैतिकता नहीं है कि हमने सत्य स्वरुप भगवान के साथ अपना संग जोड़ा है | वैसे कहते है कि परमात्म के बिना एक पत्ता भी नही हिलता , वो जानीजाननहार है, जो हम करते है, वो सुनता भी है और देखता भी है | तो हम झूठ बोलते है तो क्या भगवान नहीं सुनता ? भगवान से लोग धोखा करना चाहते है, क्या इतने चालाक हो गये हो कि  अपनी मक्कारी से भगवान पर भी जीत पाना चाहते हो ? इसका मतलब क्या हुआ ? क्या  हमने ये समझा है कि परमात्मा हमसे क्या चाहता है? इसका परिणाम क्या होगा ? कोई कहता है, मुझे तो ज्ञान समझ में आ गया, मै ज्ञान में चल रहा हूँ | ज्ञान में चल रहा हूँ और ज्ञान में होने बाद की हुई गलती का सौगुणा दंड मिलेगा, सजा मिलेगी, क्या ये भी याद रहता है ? हम कहते है कि हम परमात्मा को मानते है, हम आस्तिक है | भक्तिमार्ग में भी लोग परमात्मा को माहते है, लेकिन जानते नहीं है | हम तो जानकार मानते है | परमात्मा को जानते है, लेकिन क्या परमात्मा की बात को मानते है ? किसी ने कहा कि हम गीता को मानते है | गीता को मानते हो, लेकिन क्या गीता की मानते हो ? गीता में लिखा हुआ है कि काम, क्रोध, लोभ, मोह नर्क के द्वार गीता की ये बाते मानते हो ? ऐसे ही गीता को मानने का क्या भाव है ?
जब हम कहते है कि हमने परमात्मा को जाना है, माना है, तो हमारे कर्म क्या कहते है? हमारे कर्म कैसे है, हमारे कर्मो से क्या प्रतीत होता है, क्या हमने परमात्मा को जाना है ? हम कहते है कि सच्चे के साथ सच्चे होकर चलो, नियत साफ़ तो मुराद हासिल , तो नियत ही  ख़राब है तो जितना भी योग लगाइए, जितने भी भाषण करिए, रहेंगे वही के वही |  अगर नियत साफ है तो कुछ चालाकी, मक्कारी, चापलूसी करने की जरुरत ही नहीं | भगवान के महावाक्य है, बच्चे ! नियत साफ़ होगी तो मुराद हासिल होगी | मुहब्बत करेंगे तो मेहनत करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी | क्या हम परमात्मा की ये बात मानते है ? परमात्मा कहते है कि जिम्मेवारी मेरे को दे दो , तुम क्यों चिंता करते हो | नियत साफ़ रखो सबकुछ तुमको मै दे देता हूँ |
               


व्यक्ति के मन में क्या है, उसके बोल बताते है, बोल उसके भाव को प्रकट करते है, लेकिन परमात्मा के महावाक्य परमात्मा के मन को प्रकट करते है | वचन, मनुष्य के मन की अभिव्यक्ति होते है | विचार, मंथन, चिंतन, मनन मन के भावो को वाणी व्यक्त करती है | भाषा में अभिव्यक्त करती है | परमात्मा के जितने भी महावाक्य है, परमात्मा के मन में क्या है, ये बताते है उनमे परमात्मा ने बता दिया है कि उसको कैसे बच्चे चाहिए | साफ दिल वाले, साफ नियत वाले, मुहब्बत वाले | तो हम अगर अपने को ज्ञानी समझते है और परमात्मा के भाव को जानते है, उनके जैसे बनना चाहते है तो हमें सत्य साफ़ नियत वाले बनकर परमात्मा का प्यारा बनना है | स्वयं को स्वयं द्वारा ही होने नुकसान से बचाना है | तो हम झूठ क्यों बोले ?  झूठ क्यों करे ? दुसरे को गिराने की क्यों सोचे ? जब इसमें हमारा ही अकल्याण है ?

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