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 आप हिम्मत का एक कदम बढाओं तो परमात्मा की सम्पूर्ण मदद आपके साथ होगी !

हमारी वृत्ति और द्रष्टि सब कुछ है


हमारी वृति,द्रष्टि प्रवत्ति सही हो जाए तो हमें भगवान का शरण मिलता है, तब विश्व का परिवर्तन होता है !

सबकी मत है कि जो कुछ हम सोचते है उसके आधार से जीवन है, लेकिन क्या आपको ये सही लगता है ? हमें तो नहीं लगता, इसमें मत ना मिलने का मतलब ये नहीं कि सोचने से जीवन नहीं बनता, लेकिन सोच के ऊपर भी कुछ ऐसी चीजे है जिसके बारे में हम कभी नहीं सोचते | शायद सभी का अनुभव होगा कि सोचता तो बहुत अच हूँ लेकिन कुछ बदलता नहीं है | तो इस बात को लेकर चिंतन चला कि इसका कारण क्या हो सकता है ? हमारे हिसाब से जो कारण है वो है हमारी वृति, जो हमारा सबकुछ बदल कर रख देती है |


आपने कभी तालाब के अन्दर कोई कंकड़ फेका है ! हमने तो फेक कर देखा कि जब पत्थर पानी के अन्दर गिरता है तो उसके चारो तरफ गोल-गोल वृत के आकर का एक घेरा बनता है | जैसे एक घेरा पूरा होता है तो दूसरा घेरा उसके पूछे चलता चला जाता और ये इतना तीव्र गति से होता है कि हम अगर एक पलक झपकाएं तो कम से कम दो-तीन बार वृत बन ही जाता है | ऐसे ही हमारे संकल्पों का खेल चलता है, एक संकल्प पूरा होता है उसके पीछे दूसरा,फिर तीसरा,फिर चौथा, ऐसे संकल्पों का वृत बनता चला जाता | अब देखो आप इन दोनों में समानता क्या है ? हमने उधर जब पत्थर फेंका तब जाकर वृत या गोल-गोल घेरा बनता है, वैसे ही कोई भी संकल्प ऐसे तो नहीं चलता होगा ना ! उसमे कोई ना कोई तो परिस्थितियों का पत्थर फेंका होगा ना तभी तो संकल्प चलते होंगे | सारा संसार इस बात को लेकर अपने आप से ही झूठ बोल रहा है, किसी से पूछो कि आपका मन ठीक नहीं है,तो कहेंगे कि नहीं-नहीं ऐसी कोई बात नहीं है | तो हमें ऐसा क्यों लग रहा है कि आपके कच संकल्प चल रहे है या तो ऐसी कोई बात होगी जो किसी को बताना नहीं चाहते | आप देखिये, सबके साथ ऐसा चलता ही है | उसका प्रमाण ये है कि उस व्यक्ति की नींद पूरी नहीं होगी, उसके हाथ-पैर बीच-बीच में हिलते रहेंगे, वो अपने नाख़ून दांतों से काट रहे होंगे, उनका चेहरा धूमिल सा रहेगा हमेशा सुस्ती,आँखों के निचे काले घेरे, तबियत बीच-बीच में ऊपर-नीचे ये निशानियाँ है आपके संकल्प चलने के | यदि आपके संकल्प नहीं चलेंगे, शुद्ध या श्रेष्ठ चलेंगे तो आपके साथ उपरोक्त बाते नहीं होंगी | संकल्प चलें का आधार तीन है – 1. पूर्व मान्यताएं, 2. पूर्व अनुभव, 3. सूचनाएं | कोई भी विचार ऐसे ही हमारे अन्दर नहीं आ जाते | या तो आपने वो चीज कभी देखा है या तो कभी सुना है या कही पढ़ा है | हम ये कह सकते है कि आज हमारे मन में कुछ भी हमारा नहीं चल रहा है,सबकुछ देखि-सुनी या अनुभव की हुई बाते के आधार से ही चल रहा है | बड़े विश्वास से लोग कहते है कि हमने यह बात देखी है, हमने यह बात सुनी है, अब देखी और सुनी बात पर विश्वास तो किया जा सकता है ! परन्तु हम इस बात को गलत सिद्ध कर सकते है कि देखी-सुनी बात पूरी तरह से सत्य नहीं हो सकती | उदाहरण के लिए, अगर एक लड़का और लड़की कही एक साथ चल रहे हो तो उन्हें देखकर मान्यताओं के हिसाब से ही विचार आयेंगे  कि ये भाई-बहन हो सकते है, मित्र हो सकते है या पति-पत्नी हो सकते, लेकिन इसको प्रमाणित कौन करेगा ? इसी को देखकर ही आज लोगो का दुनिया में भाव बदल चूका है, बस देख सुनकर अपना और दूसरो का मूड ख़राब करते रहते है | हर एक मान्यता, हर एक सूचना, हर एक पूर्व अनुभव की इतनी बार पुनरावृति हुई है कि वो सबके मन में बैठ चुकी है, निकलती ही नहीं है, उसी की वजह से हमारा मन ख़राब होता जा रहा है |
अब देखो हमारा परमात्मा हमसे यही बात तो निकलवाने आया है कि जब तुम शरीरो को देखते हो तो उनकी हरकतों के आधार से अपने भाव बदलते जाते हो, अपना मन ख़राब करते जाते हो, जबकि सभी को चलाने वाली शक्ति जो हमें चलाने वाली है, उसके अन्दर भरे संस्कारो के आधार से हरकते सबकी अलग-अलग है | हम हर एक के संस्कार को नहीं देखते, उसके रिफ्लेक्शन को देखते है और मन ख़राब कर लेते है | परमात्मा हमें इसलिए प्यार कटे है क्योंकि वो हमारी ज्योति बिंदु आत्मा को देखते है और उसी को प्यार करते है, शरीरो को नहीं देखते | इसलिए हमें भी अगर अपना मूड ठीक करना है तो अपना वृति में बार-बार ये बात डालनी है कि सब बहुत अच्छे है | तब देखो हमारा जीवन यूँ चुटकी में बदलता है, नहीं तो ऐसे ही कुढ़-कुढ़ के जीते रहेंगे | समझा ! इसीलएस्वयं को ऐसा बनाओं कि जहाँ तुम रहो वहां सब तुमको प्यार करे | जहाँ से चले जाओ वहां तुमको लोग याद करे, और जहन आप पहुँचने वाले हो वहां लोग आपका इंतजार करे | यही जीवन है
                 
                     
प्रेम जीवन की यथार्थ नियंत्रक शक्ति है | जीवन रुपी घोड़े को प्रेम रुपी लगाम द्वारा ही नियंत्रित किया जा सकता है | प्रेम को परिभाषित करते हुए एक दार्शनिक ने कहा है कि अपने समस्त कर्मो को परमात्मा को समर्पण करके, परमात्मा के लिए समर्पित हो जाना ही सच्चा प्रेम है | प्रेमी ह्रदय उदार होता है | वह दया और क्षमा का स्वरुप होता है | प्रेम की अवस्था को प्राप्त करना ही सिद्ध अवस्था है | प्रेम एक ऐसी दिव्य औषधि है, जिसका रसपान करने से जीवात्मा के जन्म-जन्मान्तर के पाप व् दुःख के जो भी मूल कारण है, जलकर भस्म हो जाते है | प्रेम एक चुम्बकीय शक्ति है, जिसके प्रयोग से अजामिल जैसे पापी का भी ह्रदय परिवर्तन किया जा सकता है | महात्मा बुद्ध के द्वारा अंगुलीमाल का ह्रदय परिवर्तन होना, प्रेम की शक्ति का एक अदभुत उदाहरण है परमात्मा भी यही कहते है कि जो मुझे दिल से याद करता है, वो सदैव मेरे ह्रदय में वास करता है |
आज का समाज पूरी तरह से गिर चूका है | सभी एक दुसरे का असम्मान,चरित्रहनन और अनैतिकता के साथ जुड़े हुए है | संकटकालीन स्थिति में हमें आध्यात्मिकता एवं नैतिकता ही एकमात्र मार्ग नजर आता है | आध्यात्मिक शक्ति के आधार से ही समाज में फैले हुए विकारो के प्रदूषण को समाप्त किया जा सकता है | गहराई से चिंतन करने से हमें ज्ञात होता है कि विकारो का असली जनक देह-अभिमान है, जिससे विकारो की उत्पत्ति होती है | वास्तव में आत्मा अजर-अमर और अविनाशी है, शरीर जड़ है | आत्मा एक चैतन्य शक्ति है , जब तक सत्य-असत्य,प्रेम और द्वेष के अंतर को स्पष्ट रूप से नहीं जाना जाता, तब तक हमारे अंतरमन से विकारो का जहर नहीं मिट सकता | दैहिक प्रेम घ्रणा, द्वेष,बदले की भावना को जन्म देता है | आत्मिक,परमात्मिक प्रेम से आध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्यों की वृद्धि होती है |
जैसे कि गीता में भी वर्णित है कि है कि जब धर्मग्लानि होती है, तब परमात्मा अवतरित होकर अधर्म का विनाश और आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना करते है | कितना अनोखा और विचित्र संयोग है | राजयोग के गहन अभ्यास द्वारा जीवात्मा विकारो की अग्नि को समाप्त कर ज्ञान की शीतलता से भरपूर हो जाती है | जब आत्माएँ ईश्वरीय ध्यान की उच्चतम अनुभूति की आनंदमय अवस्था को प्राप्त कर लेती है, तो उनका मन-मयूर प्रफुल्लित हो उठता है |
परमात्मा से जब हमारी प्रीत जुट जाती है, उस प्रेत से हम हर सम्बन्ध का सुख लेते है, जिससे हमारे अन्दर तो प्रेम की जागृति होती ही है, साथ ही विश्व में प्रेम शांति,एकता एवं दिव्यता जैसे गुणों का संचार होने लगता है | हमारे व्यक्तित्व में पारदर्शिता एवं दिव्यता की झलक स्वतः द्रष्टिगोचर होती है | विश्व एक परिवार है, बेहद की ये श्रेष्ठ भावना पैदा हो जाती है | तो आइये प्यारे भाइयों और बहनों,हम सब परमात्म प्रेम में खो जाए और आत्माओं को खुले दिल से स्वीकार कर उनके अन्दर भी शाश्वत प्रेम जागृत करे | यही सबसे बड़ा पुण्य है |


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