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 आप हिम्मत का एक कदम बढाओं तो परमात्मा की सम्पूर्ण मदद आपके साथ होगी !

बच्चे करते है अनुकरण माता-पिता का



दुनिया में प्रत्येक माता-पिता का ये सपना होता है कि उनकी संतान सुयोग्य , सुशिक्षित ,संस्कारी व् आज्ञाकारी हो | इसके लिए उनका सदा यही प्रयास रहता है कि वे अपने बचो को श्रेष्ठ संस्कारो की पूँजी ही विरासत में दे | नि:संदेह दुनिया में अगर परमपिता परमात्मा के पश्चात् किसी का स्थान है तो वह माता-पिता का ही है | माता-पिता के प्यार, त्याग और पालना को कोई भी शब्दों में बयान नहीं कर सकता है लेकिन आजकल बच्चे माता-पिता के सपने पुरे करने में सक्षम नहीं हो पा रहे, कारण क्या है ?

      माता-पिता पूछे स्वयं से एक सवाल

मेरा सर्व माताओं-पिताओं से विनम्र निवेदन है कि एक बार सच्चे दिल से स्वयं से पूछे, हम जैसा अपने बच्चो को बनाना चाहते है, क्या हम स्वयं वैसे है ? माता-पिता चाहते है कि उनकी संतान सदा सत्य बोले पर वे स्वयं से पूछे, क्या हम स्वयं सदा सत्य की राह पर चलते है ? माता पिता उनसे क्या चाहते है परन्तु माता-पिता जो करते है, बच्चे फालो अवश्य करते है |

           बने अच्छे इन्सान

मै कही भी जाता हूँ – चाहे स्कूल में, सम्बन्धियों के पास, दोस्तों के पास, सभी मेरे शांत स्वभाव और अनुशासन से बेहत\द प्रभावित होते है | दिल की गहराइयों से मै इसका श्रेय परमपिता परमात्मा व् अपने माता-पिता को देता हूँ | मेरी मम्मा सदा यही कहती है, आप भले ही एक अच्छे डॉक्टर,वकील, इंजीनियर.......न  बने पर एक अच्छे इन्सान अवश्य बने | इसके लिए उन्होंने मेरा दाखिला, जब मै मात्र ढाई वर्ष का था , एक अदभुत विद्यालया में करवाया जिसका नाम है,प्रजापिता ब्रह्मकुमारिज ईश्वरीय विश्व विद्यालया | यहाँ नैतिक मूल्यों व् राजयोग की शिक्षा हर आयु के बच्चो को नि:शुल्क दी जाती है | इस विद्यालय

में दो वर्ष का बच्चा भी जा सकता है तो 80 वर्ष का भी क्योंकि परमपिता परमात्मा तो सबके पिता है | वहां मै प्रतिदिन मात्र एक घंटा सहज राजयोग की शिक्षा लेता हूँ |

      एक घन्टे के बदले अमूल्य प्राप्तियाँ

मेरी मम्मा कहती है, अपने बच्चो को अच्छा इन्सान बनाने के लिए मुझे भी तो अच्छा बनना होगा | इसलिए बे भी मेरे साथ प्रतिदिन सुबह, मेरे स्कूल के समय से एक घंटा पहले,इस विश्व विद्यालय में जाती है | आयु छोटी होने की वजह से शुरू में मुझे भले ही ज्ञान समझ में नहीं आता था पर वहां का सात्विक और दिव्य वातावरण बेहद प्रभावित करता था | धीरे-धीरे ज्ञान की सभी बाते मुझे अच्छी तरह समझ में आने लगी और प्रदीन राजयोग का अभ्यास करने से ज्ञान को स्वयं में धारण करने की शक्ति आने लगी | मै कभी स्वप्न में भी नहीं सोच सकता था की प्रतिदिन मात्र एक घंटा देने से मुझे जिन्दगी के हर क्षेत्र में इतनी अधिक अमूल्य प्राप्तियाँ होगी |

           स्वयं को समय देने के फायदे

वास्तविकता तो यह है कि आज हम भौतिक साधनों, सुविधाओं के पीछे इतने अधिक दौड़ रहे है कि हमारे पास स्वयं के लिए समय ही नहीं है | इसी वजह से सच्चा सुख कही खो गया | अगर माता-पिता चाहते है की हम बच्चो को नैतिक मूल्य विरासत में दे तो कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ेगा ही ! पर इतनी बड़ी प्राप्ति के लिए अगर अपने व्यस्त समय में से मात्र एक घंटे का समय निकलने की कीमत देनी पड़े तो यह कितनी छोटी-सी कीमत है | जब हम आध्यात्मिक ज्ञान व राजयोग कि ओर अग्रसर होते है तो हम स्वयं के लिए समय देते है जिससे स्वयं कि कमी, कमजोरियों को जान पाते है | हमारा सम्बन्ध परमपिता परमात्मा से जुड़ जाता है , जो गुण व शक्तियों के सागर है | इससे हमारे अन्दर भी गुण व शक्तियाँ आने लगती है | जब हम स्वयं गुणों से भरपूर होंगे तो दुसरो तक वे अपने आप पहुँच जायेंगे | मेरे पास मेरा अपने कुछ भी नहीं है , सब परमपिता परमात्मा निराकार शिव बाबा का दिया हुआ है इसलिए जब भी कोई मेरे किसी भजी गुण की तारीफ़ करता है तो मेरे नयन परमात्मा के प्यार से भर जाते है | मै तहेदिल से चाहता हूँ कि सब उस गुणों के, प्यार के सागर से भरपूर हो | अनुभव लिखने का मेरा लक्ष्य भी यही है कि सब परमपिता परमात्मा के निस्वार्थ प्यार के अनुभवी बने | उनके गुण व शक्तियों के अधिकारी बने |

 

 

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प्रतिशोध और आत्मशोध

शोध शब्द का अर्थ होता है खोज परन्तु जब इस शब्द से पहले ‘प्रति’ अव्यय लग जाता है तो इसका अर्थ हो जाता है बदला | लेने वाला एक प्रकार से शोध (खोजबीन) तो करता है परन्तु वह सामने वाले की करता है |इस अर्थहीन खोज का उसे कोई मूल्य नहीं मिलता बल्कि वह अपने अमूल्य पालो को नष्ट कर देता है | मूल्य तब मिले जब वह प्रतिशोध की बजाय   आत्मशोध करे अर्थात स्वयं की जाँच करे | इससे उसके समय और शक्तियों पर व्यर्थ की आंच नहीं आएगी कीमती संकल्प हुए स्वाहा बदला शब्द भी हमें सन्देश दे रहा है कि हम क्या मांग रहे है ? बद माना बुरा और ला   माना लाओ | भावार्थ यही हुआ कि हम आह्वान   कर रहे है कि बुरे को हमारे पास ले आओ | जिसके भीतर बदला लेने की अग्नि सुलगती है उसे यह पता ही नहीं चलता की इसे सुलगाये रखने के लिए वह अपने कितने कीमती संकल्प ईधन के रूप में इसमें झोंक चूका है | झोकते रहने में महीनों और वर्षो गुजर जाते है | इस अन्तहीन निरर्थक प्रक्रिया में वचन और कर्म की शक्ति हां हास भी कम नहीं होता | बदले अपनी चाहना को किसी ने हमारी चाहना के प्रतिकूल व्यवहार किया और हम बदले पर उतारू ...

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