मानव आत्मा जब तक शरीर में है, कर्म से मुक्त नहीं हो सकती | उसमे भी युवावस्था सर्वाधिक कार्यशील अवस्था है | इस अवस्था में उसमे अतिरिक्त शक्ति होती है | यदि इस अतिरिक्त शक्ति का रचनात्मक कार्यों में प्रयोग न किया जाए अथवा युवकों को संतोष,शांति,सद्विचार देने वाला कोई उपाय न अपनाया जाये तो वह अतिरिक्त शक्ति या तो उन्हें बुरी आदतों में दाल देती है या वे उन शक्तियों का दुरूपयोग विध्वंसात्मक गतिविधियों में करते है | अतः कर्म के साथ धर्म अर्थात सद्गुणों की धारणा का संतुलन बाल्यकाल से ही अनिवार्य है | हम कह सकते है कि जब मानव सर्वाधिक कर्मशील हो तब उसका सर्वाधिक धर्मशील होना भी अनिवार्य है | धर्म कहता है, झुक जाओ मान लीजिये, दो गाड़ियाँ आमने-सामने है | दोनों के चालको को अपने-अपने कार्य की जल्दी है | एक कहता है, तुम पीछे हटो , मै निकलू | दूसरा कहता है, नहीं, तुम थोड़े पीछे हट जाओ, पहले मैं निकल जाता हूँ | इस मै-मै में दोनों अकड़कर खड़े है | दोनों कर्मशील तो है,दोनों को अपने-अपने कार्यो ...
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