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सर्वागीण मेकप



                 

रीर का सुन्दर और स्वस्थ होना एक बहुत बड़ी नेमत है | मंदिरों में जिन देवी –देवताओ के दर्शनों के लिए भीड़ उमड़ती है उनकी आंतरिक दिव्यता के साथ उनका सुन्दर शरीर भी आकर्षण का केंद्र होता है | अतः देवताओं का वंशज मानव भी अपने को सुन्दर बनाना चाहता है और इसके लिए वह मेकप का सहारा लेता है |
                        
                      



मेकप (Meke-up) का अर्थ होता है कमी को पूरा करना | यदि किसी की आंख की सुन्दरता में कोई कमी है तो वह बनावटी साधनों के द्वारा आँखों को सुन्दर बना सकता है | होठो की सुन्दरता में कमी है तो बनावटी लेप लगाकर उन्हें सुंदर बना सकता है | सम्पूर्ण चेहरे की सुन्दरता को बढ़ाने वाली भी कई प्रकार के लेप बाज़ार में मिलते है | इसी प्रकार हाथों , पावों , उंगलियों की सुन्दरता भी बढाई जा सकती है |
                
           



कमी केवल बाह्म इन्द्रीयों और चेहरे में ही नहीं होती जिनका मेकप करके हम सर्वाग सुन्दर बन जाएँ | कई बार शरीर को निर्मित करने वाले विभिन्न तत्वों में भी कमी आ जाती है | उनका भी मेकप होना चाहिए | आँख , नाक, होठ कितने भी सजे हुए ह पर यदि शरीर में खून की कमी है तो चेहरे का पीलापन सारा मेकप बिगाड़ देता है | यदि शरीर की हड्डियाँ, त्वचा के बाहर झांक रही हो तो भी चेहरे का सारा मेकप फीका पड़ जाता है | अतः बाहरी मेकप के साथ-साथ शरीर के भीतर तत्वों को संतुलित मात्रा में बनाये रखना , उनकी कमी ना होने देना भी जरुरी है |
                   
             

जन्म के समय शरीर की लम्बाई और मोटाईमें एक संतुलन होता है परन्तु बाद में कई बार बिगड़ने लगता है | कभी पेट बहार निकल आता है और कभी बहुत अन्दर चला जाता है | दोनों आवस्थाओं  में मेकप की जरुरत है | संतुलित शारीरक आकार, चेहरे की सुन्दरता की कमी पूरी कर सकता है | अतः बढ़े हुए मोटापे को कम करना या अति दुबलेपन को दूर करना, यह भी मेकप का एक हिस्सा है |
                      
                       



उपरोक्त तीनो पहलुओं के साथ-साथ मेकप का एक चौथा पहलु भी है और वह है आत्मिक गुणों का मेकप | मान लीजिए , किसी व्यक्ति ने चेहरे को, शरीर को बहुत सुन्दर सजा लिया पर अन्दर में क्रोध का ज्वार है जिसकी भंगिमा चेहरे पर स्पष्ट दिखाई पड़ रही है | क्या क्रोध से भरा चेहरा सुन्दर लग सकता है ? हमने बाहर मेकप किया, बाहरी कमी को पूरा किया पर अन्दर जो शांति की, धैर्य की, प्रेम की,पवित्रता की, सहनशीलता की कमी है इसे पूरा किये बिना सुन्दरता अधूरी है |
          
     



क्रोध क्या है, क्यों आता है ? क्रोध , बिना प्रयास किये,बिना मेहनत किए तुरंत प्राप्ति करने की प्रवृति का नाम है, कैसे ? एक मालिक के घर जोकर नया आया है | उसे मालिक के कार्यालय की सफाई का काम दिया गया है | नौकर द्वारा साफ किये कमरे को देख मालिक खुश होने के बजाये आग बबूला हो रहा है की तुमको कुछ नहीं आता | माना की उसे कुछ नहीं आता तो उसे सिखाने में समय और मानसिक उर्जा लगाइए | हम ये दोनों नहीं लगाना चाहते पर कार्य एकदम बढ़िया चाहते है | हम समय न लगाकर क्रोध द्वारा उसे मिनट मोटर में हुआ देखना चाहते है , इस प्रवृति का नाम है क्रोध |
             
                  


 एक शांतिप्रिय व्यक्ति अपने सामने आने वाली प्रतिकूल बातो, परिस्थितियों और व्यक्तियो को देखकर सोचता है की इन्हें पार करने के लिए मै आंतरिक बल, शुभभावना के बल और सहनशीलता के बल का प्रयोग करूँ | भले ही इसमें मुझे थोड़ा समय लगेगा परन्तु मेरा सकरात्मक विचार सामने वाले व्यक्ति में भी और परिस्थिति में भी बदलाव लाकर स्नेह , सदभाव और समायोजन का रास्ता अवश्य निकालेगा | इसके विपरीत, क्रोध को बल के रूप में प्रयोग करने वाला व्यक्ति प्रतिकूलताओं को – आग बबूला होकर, नकारात्मक शब्द, अपशब्द बोलकर , भय दिखारकर, धमकी देकर, मिनट मोटर में अनुकूल बना लेना चाहता है | वह बिना मेहनत किये और धैर्य रखे दुसरो के बदलाव रुपी फल को पाना चाहता है जैसे की एक चोर बिना कमाए ही धन को पा लेना चाहता है |
             
           
                 
 
एक चोर किसी दुकान में घुसकर तिजोरी  से 50 हजार चुरा लेता है और सोचता है , दुसरो लोग पैसे पाने के लिए यूँ ही महीने भर मेहनत और इंतजार करते है, मैंने तो बिना मेहनत, बिना इंतजार तुरंत पासे पा लिए | लेकिन वह समाज से मुहं चिपटा फिरता है | पुलिस के भय में खाता है, भय में सोता है, कुसंग से घिरा रहता और ‘चोरी का धन मोरी में’ इस कहावत के अनुसार, उस धन को भी निरर्थक कार्यो में उड़ा देता है | क्रोध भी एक प्रकार की चोरी है | इसे हमने शैतान (रावण) से चुराया है | हम सब मूल रूप में परमात्मा शिव की संतान शांत स्वरूप आत्माएँ है | हमारी मूल दौलत शांति है | क्रोध तो रावण की सम्पति है जिसे जाने-अनजाने हमने अपना मान लिया है |
                   
              
किसी एनी की चीज हमारे हाथ में देखकर कोई टोक दे की यह चीज आपने चुराई है क्या ? तो हमें बुरा लगता है , हम उसे छिपाने की कोशिश करते है या उसके बारे में झूठे तर्क देकर सिद्ध करते है की यह चोरी की नहीं, मेरी है | इसी प्रकार कोई हमें क्रोध करते देख ले या कभी हमें का दे , आपको तो क्रोध बहुत आता है, मैंने अमुक दिन आपको लाल-पीला हुआ देखा था, तो क्या हम मान लेते है कि हाँ, मै क्रोधी हूँ ? नहीं ना | तब तो हम ‘बात ही ऐसी थी , उसे ठीक करने के लिए क्रोध न चाहते भी करना पड़ा आदि-आदि तर्क देकर अपने को ठीक सिद्ध करने की कोशिश करते है | अगर हमें हमारे क्रोध पर गर्व होता तो हम शान से कहते की हाँ, मुझमे क्रोध है पर अंतरात्मा जानती है की यह गर्व की नहीं बल्कि शर्म की बात है की हमने शैतान की वृत्ति को चुराकर उसका काफी स्टॉक अपने भीतर छिपा रखा है और जरुरत पड़ने पर चोरी-छिपे उस स्टॉक का प्रयोग भी करते है पर साथ ही यह ध्यान भी रखते है की कोई देख न ले और क्रोधी कह न दे |
   

क्रोध के अलावा रो भी तो कई विकार है जिनके रहते मेकप पूर्ण नहीं माना जा सकता | व्यक्ति कितना भी श्रंगारित हो, महंगे लिबास में हो पर यदि अहंकार की गिरफ्त में है तो अकेला पड़ जायेगा | सुन्दरता पर अहंकार का ग्रहण लग जाएगा | इर्ष्या,घ्रणा रुपी भीतर की कुरूपता , बाहर के सौन्दर्य पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर देगी | ये सभी विकार आत्मा के भीतर मूल सात गुणों (ज्ञान,पवित्रता,शांति,प्रेम,सुख,आनंद,शक्ति) की कमी के कारण उत्पन्न होते है | मेकप सम्पूर्ण तब हो जब इन मूल गुणों में आई कमी को पूरा किया जाये | हम देखते है की एक छोटे बच्चे में ये सातों गुण स्वाभाविक होते है | वह बिना बाहरी सजावट के भी सभी को आकर्षित करता है | उसकी आँखों से मासूमियत झलकती है, वाणी से सरलता , चेहरे से  निष्कपट मुस्कान और कर्मो में निश्चिन्तता होती है | पर ज्यों-ज्यों बड़ा होता है, इन आंतरिक गुणों से दुरी बना लेता है और कपड़ो , बालो जूतों आदि से सुन्दरता का निर्माण करने की कोशिश करता है , फिर भी बाल्यावस्था जैसी दिल को लुभाने वाली सुन्दरता नहीं बन पाता |
          

दिल को लुभाने वाली सुन्दरता का डाटा है दिलाराम | दिलाराम अर्थात सभी के दिलो को आराम देने वाला परमपिता परमात्मा शिव | शिव | उन्हें सत्यम शिवम् सुन्दरम् कहा जाता है | इसका अर्थ है वे परमसत्य है, परमकल्याणकारी है और परमसुन्दर है परन्तु उनके पास शरीरी तो है ही नहीं फिर उनके पास कौन-सी सुन्दरता है ? अशरीरी परमात्मा पिता के पास गुणों की सुन्दरता है, वे गुणों के भंडार है | शांति,प्रेम,आनंद आदि सभी गुणों के वे सागर है | अपनी इसी सुन्दरता के संग का रंग लगाकर उन्होंने देवताओं को सर्वागीणरूप से सुन्दर बनाया है | हम आत्मा भी मन बुद्धि को एकाग्र करके परमधाम में उनके सम्मुख स्थिर हो जाएँ तो उनकी दुआ भरी किरने हमें हमारे मूलगुणों से भरपूर कर देंगी | जैसे पार्लर में जाने वाला, ब्यूटीशियन (सौन्दर्य-प्रसाधक) के समक्ष स्थिर होकर बैठ जाता है, बाकी सारे कार्य वह ब्यूटीशियन स्वयं कर लेता है | इसी प्रकार परमात्मा पिता भी सुप्रीम ब्यूटीशियन है | हमें हमारे मन-बुद्धि को उनके सामने समर्पित करना है , शेष सजाने, श्रंगारने का कार्य वे स्वयं कर लेंगे |
   
             ➤OM SHANTI➤

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