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पकने पर बढ़ जाती है कीमत



         पके बाल
ब सर के बाल सफ़ेद होने लगते है तो इसे बालो का पकना कहा जाता है | अधिकतर फल भी पकने के बाद रंग बदल लेते है | आम, बेर आदि कच्चे होते है तो हरे रंग के होते है , जब पाक जाते है तो पीले या लाल रंग के हो जाते है | इसका साधारण अर्थ यह हुआ कि जब बाल काले थे तो हम कच्चे थे , बाल सफ़ेद हुए तो हम भी पाक गए
          
        पकने पर बढ़ जाती है कीमत 

हम देखते है कि कच्चे फल बहुत संख्या में लगे होते है परन्तु पकने तक पहुंचते-पहुँचते कई झड़ जाते  है , कइयो को कीड़े खा जाते है, कई पंछियों द्वारा कुतर दिए जाते है , कई यूँ ही टूट कर गिर जाते है, तुलनात्मक रीति से कम फल ही पककर किसी भोग कि थाली कि शोभा बढ़ाते है या किसी के उदार कि क्षुधा शांत करते है जो उपयोगिता और कीमत पके फल कि होती है वह कच्चे कि हो ही नहीं सकती | कच्चे फल अचार,मुरब्बे,चटनी,सब्जी के काम तो आ सकते है पर असली उपयोग तो पकने के बाद ही दे पाते है इसलिए उनकी कीमत अधिक होती है |
            
           गौरवान्वित करती है सफेदी 

क्या यही बात मनुष्यों पर भी लागू नहीं होती ? प्रतिदिन लाखो मानव आत्माए शरीर धारण करती है परन्तु कुछ गर्भावस्था में , कुछ संसार में आँखे खोलने के बाद, कुछ बाल्यावस्था में कुछ किशोर होते-होते और कुछ भरी जवानी में भी काल कलवित हो जाते है | पके बालो तक पहुँचने वाले भाग्यशाली ही होते है | शरीर पर आने वाले रोग, शोक , प्राकृतिक विपत्तियों के वार,दुर्घनाओसे बचकर इस पड़ाव तक पहुँचाना भाग्य नहीं तो और क्या है इसलिए यह बालो कि सफेदी स्वयं को गौरवान्वित महसूस करने के लिए है कि हम अपने को बचाते-बचाते काले बालो वाली लाइन पार कर सफ़ेद बालो के क्षेत्र में प्रवेश हो चुके है | यह भी गुप्त रूप में उन्नति ही है |
         
  समय से पहले अनुभवी होने कि निशानी 

संसार अपवादों से भरा पड़ा है | इस विषय में भी अपवाद कम नहीं है |कई लोग पैदा ही पके बाल लेके होते है और कइयो कि कच्ची उम्र में ही बाल पाक जाते है | यह परिवर्तन इस बात का संकेत है कि साड़ी स्रष्टि ही वृद्धावस्था में अथवा पकी अवस्था में है जिसका असर कुछ लोगो पर जन्म से ही या कच्ची आयु में ही दिखना शुरू हो जाता है | ऐसे लोगो को भी सन्देश है कि वे इसे परेशानी नहीं बल्कि समय से पहले अनुभवी होने कि प्राकृतिक निशानी माने |
       
   एक-एक बाल लिए है अनुभव कि कहानी

कुछ लोग दर्पण के सामने बैठकर सफ़ेद बालो के उखाड़ने या दुसरो से उखड़वने
कि कवायद करते है ऐसे लोगो से हम यह निवेदन करना चाहते है कि  एक-एक सफ़ेद बाल में आपके जीवन के एक-एक अनुभव कि कहानी लिखी हुई है | बाल उखाड़ना माना उन अनुभवों को उखाड़ फेकना | सोचिये तो सही, जीवन-यात्रा में आगे बढ़ते कभी सुनना पड़ा,कभी समाना पड़ा कभी झुकना और त्याग करना पड़ा, जाने क्या-क्या सहन करना पड़ा....| ये घटनाये घटती गई,हम पार करते गए और सफ़ेद बालो रूपी एक-एक पिल्लर इनके साक्ष्य के रूप में सर में गड़ता गया | तो क्या आप उस साक्ष्य को उखाड़ फेकेंगे? बिना साक्ष्य के कौन आपको अनुभवी मानेगा? कौन आपको उतार-चढाव देखा हुआ समझेगा? इसलिए इन्हें गड़े रहने दीजिये और देख-देख हर्षित होते रहिये कि आपके किये का प्रमाण आपके पास है |  यदि कोई चनौती देता है कि आपने जीवन में किया ही क्या है, तो झट उत्तर दिया जाता है कि ये बाल धुप में सफ़ेद नहीं किये है तो अवश्य ही अनुभवों से किये है | धूप में करना तो आसान है अनुभवों से करना मुश्किल है | तो मुश्किल से किये कार्य कि, उसकी निशानी कि कद्र कीजिये | उन्हें देख प्रसन्न होइए,बौखलाइए नहीं |
इस बात में भी अपवाद कि सम्भावना है | कुछ लोगो के बाल रहते है | सतयुग-त्रेतायुग में देवतागण भी 150  वर्ष आयुष्य भोगने के बात भी बालो कि सफेदी से बचे रहते है | कलियुग में जो लोग बहुत बड़ी आयु तक भी बालो कि सफेदी से बचे रहते थे, उनके शरीर में किसी विशेष हारमोन कि अधिकता हो सकती है जो बालो का कालापन बनाये रखने में सहायक हो | इसे वे अपने शरीर पर तमोगुणी प्रकृति का कुछ कम प्रभाव समझकर गौरवान्वित हो सकते है |
             
        सफ़ेद कर लीजिये चित्त को भी 

कुछ लोग सफ़ेद बालो को उखाड़ते नहीं पर खिजाब या मेहँदी आदि से रंगने कि कोशिश करते है | वैसे तो प्रकृति कि वास्तविक देन छिपाई नहीं जा सकती पर धन, समय और शक्ति को कुर्बान करके अल्पकाल के लिए उन्ही के लिए उन्ही पदचिन्हों को मिटने कि नाकाम कोशिश कि जाती है जो उनके अपने पैरो के है | यह सफेदी तो मन के सफ़ेद होने सन्देश लेकर आई है कि जवानी में, काले बालो के नशे में यदि जाने-अनजाने काले कर्मो का कालापन लग गया तो अब बालो के सफ़ेद होने के साथ-साथ अपने चित्त को भी सफ़ेद कर लीजिये
बाल तो प्रकृति सफ़ेद कर देती है परन्तु चित्त को सफ़ेद करने के लिए स्वयं मेहनत करनी पड़ती है | चित्त को सफ़ेद करने से पहले यह जानना आवश्यक है कि चित्त कहते किसे है, यह है कहाँ ? हम इस शब्द का कई बार प्रयोग करते है | हम कहते है , मेरे तो मन-चित्त में भी नहीं था, फिर भी अमुक कार्य हो गया |
मन आत्मा कि एक शक्ति है और कॉन्शियस(Sub-Conscious) मन और संस्कार कहते है | कई बार इन्हें उपरी मन और भीतरी मन भी कहा जाता है और अप्रत्यक्ष मन भी कहा जाता है | मन और संस्कारो को धवल करने में दिव्यबुद्धि का बड़ा महत्वपूर्ण पार्ट है | दिव्यबुद्धि मिलती है बुद्धिवानो की बुद्धि परमपिता परमात्मा से | बुद्धि , नेत्र से परमधाम में विराजमान परमात्मा पिता को निहारा जाता है और उनसे आती शक्ति और स्नेह की किरणों में अपने आत्मिक अस्तित्व को डुबो दिया जाता है तो मन और चित्त की धुलाई हो जाती है | इस नए सुख के अनुभव से पुराने दुःख, पुराणी स्मृतियां और पुराने संस्कार मिट जाते है | आत्मा (मन,बुद्धि,संस्कार सहित) उजली , पावन, सशक्त हो जाती है | फिर आयु के साथ होने वाले शारीरक परिवर्तन चिंतित या शर्मसार नहीं करते बल्कि प्रकृति की जिस योजना के तहत ये परिवर्तन होते है उसे स्वीकार करने , उससे फ़ायदा उठाने उसे देख आनंदित होने की हिम्मत आ जाती है |
 

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