मानवीय कमजोरियों को छेदने कि ताकत
छोटे बच्चे जब स्कूल जाने
लगते है अपनी पाठयपुस्तको को सरस्वती का रूप मानते है | भूल से ही पांव लग जाये तो
माथे से लगा लेते है | पुस्तक ही क्यों कोई भी छपा हुआ कागज उनके लिए पुज्निये है
| बड़ो के लिए भी छपाकागज सरवती तुल्य है |
अत:छपे हुए कागज का
निष्पक्ष सत्य प्रेरणादायक तथा प्रेमभाव बढ़ने वाला होना जरुरी है | किसी मूल्य को
सदगुण को उजागर करती हुई कोई भी छोटी सी घटना भी समाज के लोगो कि धारा बदल सकती है
|साहित्य समाज का दर्पण है और दिशासूचक भी | जनकल्याण कि स्याही में डुबोकर,
नम्रता और सत्यता से उकेरे गए शब्दों में मानवीय कमजोरियों को छेदने कि ताकत गोली
कि मार से भी अधिक होती है | यह कलम कि ताकत ही है कि वह शान्ति के मधुर राग के
साथ अपने या दुसरे के भीतर कि विक्रतियो अन्धविश्वासो, पूर्वाग्रहों, नफरतो , अशुभ
भावो को खीचकर बाहर ले आती है और एक ऐसी
तड़प पैदा करती है कि व्यक्ति उनसे छुटकारा पाए बिना चैन से रह नहीं पता है |
पुस्तक से मिली प्रेरणा
बात उन दिनों कि है जब
मैंने हिंदी पढना अच्छे से सीख लिया था और जो भी पुस्तक मिलती उसे पढ़कर अपने
आत्मविश्वास को दृढ़ कर लिया करती थी | इधर उधर पुस्तको कि खोज करने के प्रयास में
एक बार घर कि रद्दी में पड़ी हुई एक पुस्तक हाथ लगी जिसका प्रारम्भ और अंत गायब था
, बीच के पिन लगे कुछ पन्ने थे | उसे पढना प्रारम्भ किया तो लगा कि यह किसी
देशभक्त जासूस कि कहानी है | जितना हिस्सा मेरे हाथ लगा, उसका सारांश यह था कि एक
देशभक्त भारतीय जासूस पड़ोसी देश के जासूसों द्वारा पकड़ लिया गया है|उसे अंधकार बे
उससे भारतीय ख़ुफ़िया ठिकानो कि जानकारी चाहते है | न बताने पर उसे भारतीय जासूस पर
भरी अत्याचार करते है अत्याचार सहते-सहते जब वह कराहने लगा तो बोला, बताता हूँ यह
सुनकर मारने वालो के हाथ रुक गए और चेहरे पर प्रसन्नता झलक उठी | सभी एक साथ चिल्लाए,
बताओ जल्दी बताओ | देशभक्त ने थोड़ा अपने को संम्भाला फिर पूछ, बताऊँ ? उत्तर मिला,
बताओ | उसन निर्भयता से कहा, तुम सब उल्लू के पट्ठे हो|
आगे क्या हुआ , मालूम नहीं,
आगे के पन्ने नदारद थे पर उस देशभक्त के ये अन्तं निर्भयता भरे शब्द सुनकर मेरे
शरीर में बिजली-सी दौड़ गई| उस समय आयु 9 वर्ष कि थी उस बाल अवस्था में मुझे अँधेरे
से भय लगता था|
रात होने के बाद, यदि बिजली
न हो तो कमरे में जाना अकेले चाट पर जाना किसी भयंकर मुसीबत में फंसने जैसा लगता
था| इस अधूरी किताब ने जिन्दगी कि इस कमी को पुरा क दिया| इसको पढ़ते-पढ़ते रस्सो से
बंधे, मार खाते हुए फिर भी निर्भयता से
उत्तर देते हुए देशभक्त कि तस्बीर मन पटल पर स्थिर हो गई | फटी किताब रख देने के
बाद भी वह तस्वीर से हटी नहीं | इसके बाद मै अंधरे होने का बेसब्री से इंतजार करने
लगी कि आज मै भी अंधरे को इसी बहादुरी से उत्तर दूंगी | रात हुई, कमरों में लाईट
जलने लगी| अन्दर के स्टोर जैसे कमरे में अब भी अँधेरा था| मै दौड़कर वहां गई, कई
चक्कर लगे और मन ही मन कहा, अरे अंधरे, तुम तो कुछ भी नहीं हो,तुम्हारी असलियत मै
आज जन पाई| फिर मैंने लाईट जलाई और मानो तिरस्कृत अंधरे का मैंने अंतिम संस्कार कर
उसका नामोनिशान भी मिटा दिया मुझे निर्भयता जैसा अमूल्य गुण देने वाला, इस पुस्तक
का लेखक कौन है, मन में प्रश्न उठा पर पुस्तम का आगा-पीछा था ही नहीं, जानू कैसे?
मैंने उस अनजाने लेखक को ढेरो दिल कि दुआये दी और आज भी दे रही हूँ |
Comments
Post a Comment